Monday, November 20, 2017

तीन कहानियां मैनेजमेंट की: लोग अलग ही नहीं कर रहे हैं बल्कि साहसी विचारक भी बन रहे हैं

एन. रघुरामन (मैनेजमेंटगुरु)
साभार: भास्कर समाचार
स्टोरी 1: ऐसे लोग अब भी है,जो हमेशा बर्थडे और शादी का जश्न अलग तरह से मनाने की सोचते हैं। विवाह समारोह तो किसी भी परिवार में सीमित होते हैं लेकिन, बर्थडे साल दर साल मनाए जाते हैं। संभव है कुछ के
लिए साल दर साल कुछ अलग करना, सामाजिक दबाव बन गया हो। लेकिन, कुछ अन्य के लिए यह ब्रेव थिंकर यानी साहसी विचारक होने का अवसर है! 
अपने बेटे का 11वां जन्मदिवस किसी होटल में मनाने की बजाय उन्होंने इस पैसे को ऐसी अलग दिशा दी कि वहां मौजूद हर व्यक्ति हमेशा कहता रहेगा, 'ऐसा अापके जन्मदिवस पर किया गया था।' मैंगलोर के समीप बांटवाल तहसील स्थित मंची कुक्काजे गांव के स्थानीय व्यवसायी अब्दुल सत्तार अपने बच्चों के जन्मदिन कुछ अलग ढंग से मनाते रहे हैं। भिन्न तरह से मनाए जाने के बाद भी लोग उस दिन तो याद करते ही हैं, कुछ वक्त के लिए लगातार उसकी चर्चा करते रहते हैं, जब तक कि कोई दूसरा जश्न उसकी जगह ले ले। इसलिए इस बार वे चाहते थे कि जश्न ऐसा हो कि जिसकी अमिट छाप पड़े! 
अपने बेटे और बेटी के साथ पांचवीं और चौथी कक्षा में पढ़ने वाले सारे बच्चों को एक शानदार माहौल में सालभर मुस्कराने का मौका देने के लिए उन्होंने उनकी सरकारी स्कूल के क्लासरूम को पेंट करवाने का निर्णय लिया। आमतौर पर सरकारी स्कूल को पुताई या मरम्मत के किसी भी काम के लिए सरकार से अनुदान मिलने का इंतजार करना पड़ता है। जहां इन स्कूलों में विद्यार्थी सामान्यतया मिठाई बांटकर जन्मदिन मनाते हैं पर अब्दुल सत्तार ने नया उदाहरण पेश करके सारे पालकों को प्रेरणा दी है कि वे भी बच्चों के स्कूल टाइम को और भी रोशन बनाएं। उन दो कमरों में पेंटिंग का काम लगभग पूरा हो गया है, जहां इनके बच्चे पढ़ते हैं। बचा हुआ पेंट शेष क्लासरूम्स में इस्तेमाल किया जाएगा। इस बीच अब्दुल सत्तार के दिमाग में अगले साल के जश्न की योजना भी तैयार है- एक ऐसा बगीचा बनवाना, जिसकी देखभाल बच्चे अपनी टीम के साथ करें। 

स्टोरी 2: बहुत सारे लोग उम्र के 50 साल पूरे करते हैं और रिज़वान अदातिया भी 14 सितंबर 2019 को आयु का यह मुकाम हासिल कर लेंगे। यह तो स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया है। आप पूछेंगे इसमें ऐसी क्या खास बात है? यह खास है, क्योंकि ऐसे ज्यादा लोग नहीं होंगे, जो इस मौके पर अपनी दौलत दूसरों के कल्याण और परोपकार के लिए देने का फैसला करें। दो साल से भी कम वक्त के बाद रिज़वान पचास की उम्र के बाद जो भी पैसा कमाएंगे वह लोगों की सेवा में जाएगा। 
पोरबंदर में 1969 में जन्मे और अब मोजांबिक में बस चुके रिज़वान अभी 48 साल के हैं और केन्या, तंजानिया, यूगांडा, जाम्बिया, रवांडा, कांगो, मेगागास्कर आदि सहित 10 अफ्रीकी देशों में 2000 करोड़ रुपए की सफल कंपनी चला रहे हैं। रिज़वान अदातिया फाउंडेशन (आएएफ) -इसे उनके बिज़नेस की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी या चैरिटी शाखा कह लीजिए- अफ्रीका और भारत में कई विकास की परियोजनाओं पर काम करता है। जो व्यक्ति 10वीं में फेल हो गया था, जो 17 साल की उम्र में 175 रुपए प्रतिमाह कमाता था और जेब में सिर्फ 200 रुपए लेकर कांगो रवाना हुआ था; उसका किसी तय तारीख से दूसरों के लिए कमाने का फैसला अलग किस्म का फैसला तो है ही, किसी साहसी विचार से कम नहीं है। चूंकि वे कभी अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, वे ऐसे लोगों के लिए औपचारिक अनौपचारिक दोनों तरह की शिक्षा को महत्व देते हैं, जो शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते। खुद पढ़ सके, इसलिए दूसरों को पढ़ाने की जिम्मेदारी लेना बहुत ऊंची सोच है। 
स्टोरी 3: पिछले हफ्ते जयपुर की यात्रा में मैंने 60 से भी कम मकानों के गांव बिजलपुर के एक युवा सामाजिक योद्धा की कहानी सुनी। अब 17 साल के हो चुके शैलेंद्र सिंह पिछले चार वर्षों से शादी की तैयारियां कर रहे घरों पर निगाह रखने वाली वन-मैन आर्मी हैं। कुछ उनसे नफरत करते हैं कि वे अपने काम से काम नहीं रखते यानी पढ़ाई पर ध्यान क्यों नहीं देते। कुछ उन्हें चाहते हैं, क्योंकि वे यह पक्का कर रहे हैं कि कोई भी लड़की स्कूल की पढ़ाई छोड़कर बाल विवाह का शिकार हो जाए। कोई बाल विवाह नहीं, 'कोई बाल श्रम नहीं और बिना शिक्षा का कोई बच्चा नहीं' आज उनका मिशन बन चुका है। 
फंडा यह है कि दुनिया को धीरे-धीरे सिरफ अलग करके दिखाने वाले ही नहीं, साहसी विचारक भी मिल रहे हैं, जो अपनी साहसी योजनाओं से अपने आसपास के माहौल को बदलने में लगे हैं।