साभार: जागरण समाचार
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सूत्रों के मुताबिक जैश ए मोहम्मद के बारे में एक सोच रखने वाले दूसरे तमाम देशों मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि के साथ भारत लगातार संपर्क में है। आगे भी इनके साथ विमर्श जारी रहेगा। चीन के अडि़यल रवैये के बावजूद अगले तीन महीनों के भीतर दूसरा प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में उक्त प्रावधान के तहत लाया जा सकता है। चीन चाहे जो भी बहाना बनाये, लेकिन दुनिया में उसकी यह कलई लगातार खुल रही है कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर दूसरे देशों को साथ लेकर नहीं चलता।
चीन की सरकार ने गुरुवार को कहा है कि उसने इस प्रस्ताव का विरोध इसलिए किया है कि संबंधित मुद्दे पर सभी देशों के बीच व्यापक समझ बूझ पैदा हो सके। सूत्रों के मुताबिक एक तरफ यूएनएससी के 15 में से 14 सदस्य जैश सरगना अजहर को दुनिया की शांति के लिए खतरा मान रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ चीन इकलौता देश है जो अजहर के बचाव में बार-बार खड़ा हो रहा है।
अजहर पर प्रतिबंध लगाने की भारत अपनी मुहिम इसलिए भी नहीं छोड़ सकता कि उसका संगठन भारत की शांति व स्थायित्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। कश्मीर में अलगाववादी वारदातों के जरिए यह भारत की संप्रभुता व अखंडता को चुनौती पेश कर रहा है।
हाल ही में पुलवामा में भारतीय सैन्य बल पर हमला इसी संगठन ने करवाया। इसके प हले भारतीय संसद, पठानकोट और उरी जैसे हमले इसी ने करवाये। कश्मीर में मसूद अजहर के दो भतीजे मारे जा चुके हैं जो बताता है कि वह भारत विरोधी गतिविधियों में किस हद तक जा सकता है।
भारत जानता है कि मौलाना अजहर पर नकेल कसने का सीधा असर कश्मीर में आतंकी गतिविधियों पर दिखेगा। दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान यह समझते हैं कि एक निश्चित समय के बाद भारत अजहर के खिलाफ प्रस्ताव लाना बंद कर देगा। लेकिन भारत की रणनीति ऐसी बिल्कुल नहीं है। भारत यूएन के नियमों के मुताबिक लगातार अपनी कोशिश जारी रखेगा।