एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
बुधवार को मैंने देखा कि मेरे पेडिक्योर और मेनिक्योर एक्सपर्ट सड़क किनारे चाय की दुकान पर चुस्कियां ले रहे हैं। मैंने कभी उन्हें इतनी फुर्सत में नहीं देखा था, क्योंकि हमेशा उनकी भारी मांग रहती है। मैंने अपनी कार
पार्किंग में लगाई और उनके कंधे पर हाथ रखकर पूछा- सुनील आज तुम्हें इतना समय कैसे मिल गया? उन्होंने कहा- सर, साल का यह समय हमेशा ऐसा ही होता है, युवा और उनके माता-पिता की स्थिति नाखून चबाने और अपने पैरों के नाखून की ओर देखने जैसे हो जाती है, इसलिए मेरे लिए यह खाली समय होता है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। उनका इशारा एसएससी परीक्षा परिणामों की ओर था। इस बात से मुझे अपने एसएससी परीक्षा परिणाम के दिन याद गए। उम्मीद से मेरे नंबर करीब 10 प्रतिशत कम थे। फिर भी यह तब विज्ञान विषय लेकर आगे की क्लास में प्रवेश के लिए काफी थे। पिता थोड़े दुखी थे, जबकि मां को लग रहा था- ठीक है। ऊपर से हमारे मकान मालिक का लड़का जिसे मुझसे 14 प्रतिशत ज्यादा मार्क्स आए थे, लड्डू का डिब्बा लेकर गया। पिताजी ने प्यार से उसकी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा। मैं मां के साथ किचन में बैठा था और मेरा ध्यान उनकी बातों की ओर ही था। उस दिन मुझे उसकी मीठी बातों से बहुत जलन हुई थी।
मुझे अचानक अहसास हुआ कि दुनिया में एक नया अंतर गया है। डिस्टिंक्शन लाने वालों और डिस्टिंक्शन लाने वालों में। जब तक अगले दिन मेरी मार्कशीट हाथों में नहीं गई मैंने लड्डू नहीं खाए थे। इस पर पिताजी ने व्यंग्य किया था- ऐसा सख्त अनुशासन तुम्हें पढ़ाई के समय दिखाना चाहिए था, अब क्या फायदा? शुक्र है मैंने एसएससी की परीक्षा उस दौर में ही पास कर ली थी, जब 90 और 95 प्रतिशत क्लब का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था। इससे भी जरूरी यह कि तब स्मार्टफोन नहीं थे, जो इन क्लबों के सदस्यों की तस्वीरें उनकी हर गतिविधि के साथ दिखाते रहते हैं कि कैसे मीडिया ने उन्हें घेर लिया, कैसे फोटोग्राफर्स उनकी तस्वीरें ले रहे हैं, कैसे कोचिंग क्लास उनके पास मिठाइयों के डिब्बे लेकर पहुंच रही हैं और कैसे टीचर्स भी उपहार लेकर रहे हैं।
नए जमाने के कई माता-पिता तो अपने बच्चों के नज़दीक उतना नहीं होते जितना जुड़ाव उनका अपने मोबाइल फोन और अपडेट से होता है। 1975 का वो दिन मुझे याद है, मेरी मां ने एक पल के लिए भी मुझे नज़रों से ओझल नहीं होने दिया था। मेरे पिता घर के बाहर पूरी ठसक के साथ घूम रहे थे और मेरी मां घर मिलने आए चाची और चाचा के लिए कुछ मीठा बना रही थीं। मेरे एक चाचा ने तो छेड़ते कहा था- रघू परीक्षा में और अच्छा कर सकता था। मेरी मां ने तीखा जवाब दिया था- यह बेस्ट है, तुम चिंता मत करो। और फिर अगले दिन जब अखबार घर आया तो मेरे पिता को पता चला कि मेरे साथ कबड्डी और खो-खो खेलने वाले बच्चे मुझसे बेहतर अंक लाने और अखबार में फोटो छपवाने में सफल रहे हैं। वे मेरे प्रतिशतों से थोड़ा निराश थे और उन्होंने कहा- काश मैं तुम्हारी तस्वीर भी यहां देख पाता। मां तुरंत मेरे बचाव में आई थी। कहा था- कुछ समय बाद हर रोज इसकी तस्वीर अखबार में देखोगे। इस पर उन्होंने अपने चेहरे को 90 डिग्री एंगल पर झुकाकर मेरा उपहास किया था। इस उपहास से मुझे अपमान का अहसास हुआ था, लेकिन मां के सहयोग से मुझे आत्मविश्वास मिला था। कई वर्षों बाद मुझे अहसास हुआ कि अपनी-अपनी प्रतिक्रियाओं से वे दोनों अपना लक्ष्य साधने में कामयाब हुए। इसके बाद मैंने कभी भी 90 प्रतिशत से कम अंक हासिल नहीं किए और मेरी मां की बात भी सही साबित हुई।
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नए जमाने के कई माता-पिता तो अपने बच्चों के नज़दीक उतना नहीं होते जितना जुड़ाव उनका अपने मोबाइल फोन और अपडेट से होता है। 1975 का वो दिन मुझे याद है, मेरी मां ने एक पल के लिए भी मुझे नज़रों से ओझल नहीं होने दिया था। मेरे पिता घर के बाहर पूरी ठसक के साथ घूम रहे थे और मेरी मां घर मिलने आए चाची और चाचा के लिए कुछ मीठा बना रही थीं। मेरे एक चाचा ने तो छेड़ते कहा था- रघू परीक्षा में और अच्छा कर सकता था। मेरी मां ने तीखा जवाब दिया था- यह बेस्ट है, तुम चिंता मत करो। और फिर अगले दिन जब अखबार घर आया तो मेरे पिता को पता चला कि मेरे साथ कबड्डी और खो-खो खेलने वाले बच्चे मुझसे बेहतर अंक लाने और अखबार में फोटो छपवाने में सफल रहे हैं। वे मेरे प्रतिशतों से थोड़ा निराश थे और उन्होंने कहा- काश मैं तुम्हारी तस्वीर भी यहां देख पाता। मां तुरंत मेरे बचाव में आई थी। कहा था- कुछ समय बाद हर रोज इसकी तस्वीर अखबार में देखोगे। इस पर उन्होंने अपने चेहरे को 90 डिग्री एंगल पर झुकाकर मेरा उपहास किया था। इस उपहास से मुझे अपमान का अहसास हुआ था, लेकिन मां के सहयोग से मुझे आत्मविश्वास मिला था। कई वर्षों बाद मुझे अहसास हुआ कि अपनी-अपनी प्रतिक्रियाओं से वे दोनों अपना लक्ष्य साधने में कामयाब हुए। इसके बाद मैंने कभी भी 90 प्रतिशत से कम अंक हासिल नहीं किए और मेरी मां की बात भी सही साबित हुई।
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साभार: भास्कर समाचार
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