एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
जीवन की भौतिक जरूरतों की कई आदतें बदलना मुश्किल है। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए सुख-सुविधाओं और मशीनों के साथ को अचानक छोड़ना, प्रकृति के बीच जाना या दिल के कहे हर काम को करना
मुश्किल तो जरूर है, लेकिन असंभव नहीं है। मस्तिष्क का ध्यान की स्थिति में जाना जीवन का उच्च बिंदू है। हर चीज से अलग होने का विचार और जीवन को पदार्थ मानना कॉमन बात नहीं है। खासतौर पर तब जब बात एक पति की हो, जो एक बीमा विशेषज्ञ हो और साथ ही कम्यूटर के लिए कोड लिखता हो। उसकी पत्नी इंफोसिस जैसी कंपनी में सीनियर प्रोग्रामर के रूप में काम करती हो। आप कल्पना नहीं कर सकते कि जीवन में अच्छे से रचा-बसा यह युगल अपने दिल की बात सुनने के लिए सबकुछ छोड़ देगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनके पास सुरक्षित जॉब था। वे कठोर मेहनत कर रहे थे और हर माह कमाई लाखों में थी। वे हर हफ्ते पांच दिन कड़ी मेहनत करते और कई बार घर पर भी कड़ा परिश्रम होता, लेकिन उनका दो दिन का विकेंड वे अपने लिए रखते ताकि वे जंगलों की ओर जा सकें और प्रकृति के बीच जी सकें। इससे ज्यादा किसी युगल काे और क्या चाहिए? लेकिन गोविंद गौर और उनकी पत्नी श्वेता गोविंद कुछ अलग सोच रहे थे। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं।
पिछले साल एक दिन यह युगल अपने-अपने ऑफिस से ऑनलाइन चैटिंग कर रहा था और फिर अचानक गोविंद ने श्वेता को बताया, मैंने इस्तीफा दे दिया है। श्वेता जैसे सीट से उछल पड़ीं, एक के बाद एक कई सवाल पूछ डाले- क्या, कैसे, अब आगे क्या। गोविंद ने कहा मुझे नहीं पता। इसके बाद कुछ देर के लिए दोनों की बातचीत में एक ब्रेक गया। इसके 45 मिनट बाद श्वेता एक बार फिर चैट विंडो पर आईं और कहा- मैंने भी इस्तीफा दे दिया। क्या आप भरोसा करेंगे? दो लोग जो लाखों रुपए कमा रहे थे, 45 मिनट के अंतराल में बिना भविष्य की किसी योजना के इस्तीफा दे देंगे। वह भी प्रकृति के प्रति अपने प्यार के कारण लेकिन, इन दोनों के साथ ऐसा ही हुआ। अब इन्हें चैन्नई और पुडुचेरी जिसे पॉन्डीचेरी भी कहा जाता है के बीच इस्ट कोस्ट रोड के नज़दीक एक छोटे गांव में देखा जा सकता है। कल्पना कीजिए वे क्या कर रहे होंगे। वे अपने तीन बच्चों संध्या, इंदू और जयंती की देखभाल कर रहे हैं। तीनों को बचाया गया है और अब उनके पुुनर्वास का काम उनकी 14 एकड़ भूमि पर चल रहा है। ये तीनों ही छोटे हाथी हैं। इस जोड़े के इस तरह जंगल में बसने का बीज वीकेंड आउटिंग के दौर में रोपा गया था। आज उनके दैनिक कामकाज में इन विशाल जानवरों को खिलाना और देखरेख शामिल है। इन तीनों को चाहिए 300 किलो चावल रागी, अन्य अनाज और सब्जियां। इसके अलावा चाहिए 300 किलो घास और साथ में शानदार स्नान। यह जाेड़ा हाथियों की अच्छी सेहत का ध्यान रखता है और कोशिश करता है कि इन्हें घर जैसा अहसास हो। आपके और मेरी तरह अब उनके पास भविष्य के लिए एक योजना भी है, इसलिए वे आईटी कंपनियों के लिए कोड लिखते हैं और इससे मिलने वाले पैसों से वे कुछ और जमीन खरीदने की कोशिश में हैं, ताकि वहां किसी दिन वल्चर सेेंचुरी पार्क शुरू कर सकें। हममें से कई लोग आज भी चूहा दौड़ में लगे हैं, क्योंकि हमारे जीवन में लग्ज़री चीजों की जगह है, जिनके हम आदी हैं। इस लग्ज़री को बनाए रखने के लिए हम काम करते रहते हैं। कई बार अपनी इच्छा और शारीरिक क्षमताओं के खिलाफ भी हम ऐसा करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ लोगों को डर होता है कि सुविधाएं छूट जाएंगी, कुछ को डर लगता है कि लोग क्या कहेंगे।
फंडा यह है कि दिमागी शांति के लिए संत बनना जरूरी नहीं है। भौतिक जगत से अलग होकर प्राकृतिक माहौल में बस जाना भी एेसा ही है।
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
फंडा यह है कि दिमागी शांति के लिए संत बनना जरूरी नहीं है। भौतिक जगत से अलग होकर प्राकृतिक माहौल में बस जाना भी एेसा ही है।
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साभार: भास्कर समाचार
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