Friday, June 16, 2017

फर्क है सफलता और जीत में: गुणों के संग्रह से सफलता को जीत में बदलें

सफलता और जीत में फर्क है। सफलता सतही मामला है और जीत का संबंध गहराई से है। बुरे लोग भी सफल हो सकते हैं लेकिन, वे जीत गए ऐसा नहीं कहा जा सकता। बुराई बुरे लोग सदैव रहे हैं और सफल भी होते रहे हैं।
किसी भी धर्म के शास्त्र उठाएं तो पाएंगे शैतान, दैत्य जीतते रहे हैं लेकिन, यह उनकी जीत नहीं मानी जा सकती। वे विजयी नहीं, सफल हुए हैं। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। रावण और कंस ने लंबे समय राज किया। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता अर्जित की लेकिन, वास्तविक जीत उन्हें कभी हासिल नहीं हुई। हम अपने भीतर कितनी अच्छाई बचाते हैं, कितने सदगुण संग्रहित कर पाते हैं, कितना परहित करते हैं, नीति और परम्परा पर कितने टिके हुए हैं इससे हमारी विजय तय होती है। सफलता का इनसे कोई लेना-देना नहीं है। लोग गलत साधन अपनाकर भी सफल हो जाते हैं। चूंकि बचपन से पाठ पढ़ाया जाता है कि सफल होना ही है। साधन भले ही अनुचित हों, परिणाम सफलता ही होना चाहिए। यह एक सिद्धांत बन गया है और इसीलिए सफल लोग अशांत बेचैन पाए जाते हैं। सफलता को जीत में बदलना हो तो अपने भीतर सद्‌गुणों का संग्रह करना पड़ेगा। सच का साथ देना पड़ेगा, आंतरिक रूप से स्वयं को पवित्र रखना होगा। पवित्र व्यक्ति ही विजयी हो सकता है। सफलता अर्जित करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन, उस सफलता के साथ-साथ विजय की वृत्ति भी जीवित रखें। किसी को पराजित करके आप जीत नहीं सकते। असली जीत स्वयं को जीतने पर होती है और स्वयं को जीतने का मतलब होता है अपने दुर्गुणों का विनाश करना। अपनी सफलता को विजय में बदलने के लिए सांसारिक प्रयोग काम नहीं आएंगे। इसके लिए कुछ आध्यात्मिक प्रयोग करते रहिए। उनमें एक शुभ कार्य है नियमित योग। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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