Saturday, July 15, 2017

लाइफ मैनेजमेंट: पसंद के जीवन के लिए लीजिए साहसिक फैसले

एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
लाइब्रेरी और इन्फॉर्मेशन साइंस में मास्टर्स डिग्री के बाद लक्ष्मी ने 2002 में विवेक नेगी से शादी की, क्योंकि विवेक की सरकारी नौकरी थी। वे दिल्ली में असिस्टेंट टीचर थे और कक्षा पांच तक के बच्चों को पढ़ाते थे।
विवेक के माता-पिता हरियाणा में रोहतक में रहते थे लेकिन, समय के साथ दोनों को एहसास हुआ कि सिर्फ 9000 रुपए की तनख्वाह में दो परिवारों को चलाना मुश्किल हो गया है। खासकर दो बेटों परितोष और जयेश के जन्म के बाद। दोनों अब 13 और 12 साल के हो गए थे। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। कुछ साल संघर्ष के बाद 2007 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ने की हिम्मत जुटाई और रोहतक जाकर आईआईटी प्रवेश की कोचिंग क्लास शुरू की। तीन छात्रों को पढ़ाने से शुरुआत हुई और चार साल में ही यह संख्या 70 हो गई। उन्होंने एक कम्प्यूटर खरीद लिया और लक्ष्मी ने कोचिंग बिज़नेस के लिए चैप्टर के अनुसार बुकलेट, सवाल-जवाब की सैम्पल शीट अरेंज करने जैसे काम व्यावसायिक तरीके से करना शुरू कर दिए। 70 छात्रों के साथ क्लास अच्छी चल रही थी, इसलिए सामाजिक दबाव में उन्हें दोपहिया वाहन और होम लोन के जरिये घर खरीदना पड़ा। लेकिन 2011 में अचानक गिरावट शुरू हो गई। छात्रों के अंक और संख्या दोनों कम होने लगे। कारण पता करने के लिए उन्होंने कई सर्वे किए लेकिन, समाधान हाथ नहीं लगा। अब बैंक की किस्त चुकाना भी मुश्किल हो गया। किसी तरह उन्होंने तीन साल इसे जारी रखा। हालांकि, बढ़ते बच्चों की मांग, किसी तरह सामाजिक स्टेटस बनाए रखने का दबाव, हर महीने लोन चुकाना और बूढ़े होते माता-पिता के कारण परिवार आर्थिक संघर्ष में फंस गया। उधारी बढ़ने लगी। 
2014 में इन्होंने एक और बड़ा फैसला लिया। लोन के दबाव से निकलने के लिए उन्होंने घर बेचने का निर्णय किया। इसके बाद लगातार दो साल और कड़ी मेहनत कर उन्होंने निजी उधारी भी चुकाई। इस बीच लक्ष्मी ने छह महीने का ग्राफिक डिजाइन कोर्स कर खुद को अपग्रेड किया और विवेक ने अपने बच्चों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार करना शुरू किया। बच्चों ने आईआईटी से संबंधित विषयों के स्थान पर ग्राफिक डिजाइनिंग सीखना शुरू किया, लेकिन पढ़ाई को कम ही समय देते। माता-पिता ने उन्हें हतोत्साहित किए बिना उनके ऑनलाइन काम पर सख्त नजर बनाए रखी। धीरे-धीरे दोनों स्ट्रीट स्मार्ट हो गए और परितोष ने इंटरनेट मार्केटिंग के काम में प्रवेश किया। जयेश ने ग्राफिक डिजाइनिंग जारी रखते हुए पढ़ाई को ओर नुकसान पहुंचाया। 
जनवरी 2017 में परिवार ने फिर एक बड़ा फैसला किया। उन्होंने घर से ही बच्चों की पढ़ाई जारी रखते हुए ग्राफिक डिजाइन और इसकी मार्केटिंग पर फोकस किया। अमेरिका से धीरे-धीरे काम मिलने लगा। जयेश को पहले काम के लिए 1 डॉलर मिले, लेकिन छह महीने में ही उनके प्रति आर्टवर्क की कीमत 60 डॉलर तक पहुंच गई। साल के पहले छह महीने में उन्होंने 2 लाख रुपए के करीब कमाए और पिता को भी ऑनलाइन कोचिंग शुरू करने और वित्तीय स्थायित्व में मदद की। इन दोनों भाइयों के पास आज 40 नियमित क्लाइंट हैं और इसके अलावा कई सौ वन-टाइम शॉपर्स हैं। अब परिवार ने सबसे बड़ा बोल्ड निर्णय लिया है। पूरा परिवार हर काम ऑनलाइन करता है, इसलिए इन्होंने शहर की भीड़भाड़ से अलग प्रकृति के साथ रहने का फैसला किया है। इससे उनके खर्च भी कम हो गए हैं। अभी उनकी कोचिंग में आईआईटी के 40 छात्र हैं, जो विवेक की काफी ऊर्जा लेते हैं। इसे मार्च 2018 में बंद कर दिया जाएगा। पूरा परिवार कुमाऊं रीजन के पिथोरागढ़ चला जाएगा, जिसे छोटा कश्मीर भी कहते हैं। 
फंडा यह है कि जीवन वैसे जियो जैसा आप जीना चाहते हो। इसके लिए बोल्ड निर्णय करने होंगे। बिना यह सोचे कि हमारा समाज क्या सोचेगा! 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com

साभार: भास्कर समाचार 
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