Sunday, July 16, 2017

बात काम की: स्वस्थ जीवन के लिए अपने दादा नाना जैसी जीवनशैली अपनाएं

एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
गुरुवार को हम भारतीयों ने एक प्रमाण-पत्र कमाया है- 'दुनिया में सबसे आलसी लोगों में से एक', क्योंकि हम प्रतिदिन सिर्फ 4300 कदम चलते हैं! यह स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अध्ययन में पता चला है।
उन्होंने दुनिया के 46 देशों में करीब 7 लाख लोगों के चलने-फिरने की आदतों के अध्ययन के लिए स्मार्टफोन में स्टेप काउंटर लगाए थे। भारत 39वीं पायदान पर रहा, जबकि हॉन्गकॉन्ग 6880 कदमों के साथ शीर्ष पर तो 3513 कदमों के साथ इंडोनेशिया सबसे निचली पायदान पर रहा। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। जीवन में चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए हमें रोज 10 हजार कदम चलने की जरूरत है। मैं जिन लोगों के साथ रहा उनमें मेरे नाना सबसे चुस्त-दुरुस्त थे, जिन्होंने 96 साल की उम्र में दुनिया से विदाई ली और पूरी जिंदगी उनका वजन 58 किलोग्राम रहा। उनकी मौत इसलिए हुई,क्योंकि वे मुंबई में बाथरूम में गिर गए, जिससे वे कभी उबर नहीं पाए। मैंने उन्हें सुबह साढ़े तीन बजे के बाद कभी बिस्तर पर नहीं देखा, जिसे वे 'ब्रह्म मुहूर्त' कहते थे। उनके पूरे जीवन में मैंने उन्हें किसी वाहन का इस्तेमाल करते नहीं देखा। बैलगाड़ी ही उनके लिए लग्ज़री थी। 
उनके दिन की शुरुआत सुबह कावेरी नदी में तैरने और नहाने से होती थी, जो हमारे घर के सामने ही थी। जब तक वे 96 वर्ष की उम्र में अस्पताल में भर्ती हुए तब तक किसी ने उनके कपड़े नहीं धोए। कपड़ों की स्वच्छता में तो वे डिटरजेंट के विज्ञापनों को शर्मिंदा कर देते थे। पूजा कक्ष की सफाई, अपने कपड़ों को तह करके रखना, उसके बाद एक घंटे की पूजा चलती, जिसमें वे तमाम श्लोकों का जोर-जोर से उच्चारण करते, जिन्हें गली के आखिरी छोर तक सुना जा सकता था। उनके आरती के वक्त से लोग अपनी घड़ियां मिलाया करते थे। यह उनकी घड़ी की सुइयों पर चलने वाली दिनचर्या का कमाल था। वे मुझे दो बातें कहा करते थे, 'मैं इसे जोर-जोर से बोलता हूं ताकि घर में तुम लोग और अड़ोसी-पड़ोसी अच्छी बातें सुनें। इसका फायदा तुम लोगों को कुछ वक्त बाद मिलेगा। इससे मैं अपनी विचार प्रक्रिया अच्छी बातों पर केंद्रित रख सकता हूं।' फिर वे मंदिर जाते, जहां वे गर्भगृह की 108 परिक्रमाएं करते, जो एक तरह की मॉर्निंग वॉक होती थी, वह भी हर दिन। उनके ओंठ 'गायंत्री मत्र' बुदबुदाते रहते और उनकी अंगुलियां 'अंगवस्त्र' के नीचे मंत्रों की गिनती करते रहते। वे 8 बजे लौटते और पिछले दरवाजे से घर में आते। वे सारे पेड़ों पर निगाह डालकर उनका जायजा लेते और उसी तरह केले नारियलों की संख्या भी ध्यान में रखते। वे उस दिन लगने वाले केले के पत्ते ठीक संख्या में तोड़ते, उन्हें धोते और फिर सीधे नाश्ते के लिए पहुंचते। 
नानी उन्हें नाश्ता देतीं और वही वक्त होता जब मैं उन दोनों को गंभीर विचार-विमर्श करते देखता। चर्चा दिन के मेन्यू से शुरू होती। नानी अपने दिमाग में बहुत ही जटिल एलगोरिदमिक समस्या सुलझातीं, जिसमें बहुत सारे वेरिएबल होते जैसे घर में क्या-क्या उपलब्ध है, घर में कितने सदस्य हैं, कोई नई चीज खरीदने के लिए पैसा है या नहीं। उसके बाद वे कोई सुझाव देतीं। हम सबको नाश्ता लेकर बाहर चले जाना होता था। वे 10-15 मिनट उनके अपने निजी पल होते थे। नाश्ते के दौरान वे इस बात पर 'विशेष टिप्पणी' देते कि कौन-से मसाले डाले जाने चाहिए और क्यों। यह इस बात पर निर्भर होता कि घर के किस सदस्य को क्या समस्या है। हल्दी रक्त-शुद्धि के लिए, गला यदि बैठा हो तो अदरक, बुखार दूर करने के लिए काली मिर्च और गठिया के दर्द से मुक्ति और बालों की सेहत के लिए सरसो। वे भारतीय मसालों और उनके गुणों के एनसाइक्लोपिडिया थे। फिर अगले 45 मिनट उनके रोज के रूटीन कामों के लिए होते, जबकि घर से बाहर जाने के छोटे-मोटे काम घर के आठ बच्चों में से किसी को सौंप दिए जाते। उन्होंने तो कभी बीमारी के कारण छुट्‌टी ली और अपने दफ्तर कभी देर से पहुंचे। उनका रात का भोजन शाम 6:30 बजे तक हो जाता। अगले दो घंटे वे घर के बाहर चहलकदमी करते, जिसमें अपने हमउम्रों के साथ स्थानीय वैश्विक घटनाओं पर 'नुक्कड' बैठकें भी हो जातीं। रात 9 बजे वे घर के मुख्य द्वार को बंद करके सोने चले जाते। 
फंडा यह है कि यदि स्वस्थ जिंदगी जीना चाहते हैं तो कैसी जिंदगी बिताएं जैसे हमारे ग्रैंड पेरेंट्स बिताते थे।

Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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