Sunday, June 18, 2017

जितना आप पढ़ेंगे, आपका दिमाग उतना ही खुद को रीवायर कर सकेगा

एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
जब आप भोपाल आएंगे तो मैं आपको 'मसाज' कर दूंगा/दूंगी। शनिवार को संयोग से ही मेरी निगाहें उस वॉट्सएप मैसेज पर चली गई, जो बीप की आवाज के साथ मेरे साथ वाली सीट पर मुंबई से भोपाल की दूधवाला
प्लाइट में बैठी युवती के मोबाइल फोन पर आया था। एक सेकंड से भी कम समय में मैंने अपनी आंखें उसके मोबाइल स्क्रीन से हटा लीं और फिर अपने अखबार पर ध्यान केंद्रित करने की नाकाम कोशिश करने लगा। मैं आंखों की किनारे से इस मैसेज पर उस युवती की प्रतिक्रिया को देख रहा था। मैंने यह पाप किया, यदि आप चाहे तो कह सकते हैं। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। मुझे यह देख बहुत धक्का लगा कि उस युवती के चेहरे अथवा उसकी आंखों में कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आई बल्कि उसने तो वह जो भी कोई था उसे पूरी शांति से जवाब भेज दिया, 'ओके, मैं आपके 'मसाज' का इंतजार करूंगी।' मेरे मन में उसकी अंग्रेजी शिक्षा, शिक्षक और कॉलेज को लेकर आलोचना का भाव था। मुझे ऐसा लगा कि उसके पूरे मस्तिष्क को ही तेजी से 'रीवायर' करने की जरूरत है। मुझे हाल ही में नीटरलैंड्स के मैक्स फ्लैक इंस्टीट्यूट ऑफ सायकोलिग्विस्टिक्स और लखनऊ के सेंटर ऑफ बॉयो-मेडिकल रिसर्च, हैदराबाद यूनिवर्सिटी और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी द्वारा संयुक्त रूप से 21 अशिक्षित वयस्कों पर कराई रिसर्च की याद आई। इनमें से करीब 30 की उम्र की 20 महिलाएं थीं। 
शोध इस बारे में था कि 'पढ़ना सीखने से मस्तिष्क कैसे प्रभावित होता है। इस अनोखे प्रयोग में 21 पूरी तरह अशिक्षित वयस्कों को हिंदी पढ़ना-लिखना सिखाया गया। एकदम अक्षरों से शुरुआत कर, शब्द, वाक्य और व्याकरण तक। कोर्स के पहले और बाद में शोधकर्ताओं ने फंक्शनल मैग्नेटिक रीजोनेंस इमेजिंग से ब्रेन मैंपिग की। इसके तहत रक्त में ऑक्सीजन के स्तर में आए बदलाव को नापकर मस्तिष्क की सक्रियता का पता लगाया जाता है। शोध का लक्ष्य यह पता लगाना था कि 'पढ़ना सीखने' के परिणास्वरूप मस्तिष्क के किस हिस्से में अधिक सक्रियता दिखाई देती है। नतीजों ने कई लोगों को चौंका दिया। जहां वैज्ञानिकों को अपेक्षा थी कि मस्तिष्क के आउटर कॉर्टेक्स क्षेत्र में कुछ विकास दिखाई देगा पर उन्हें मस्तिष्क की गहराई वाले क्षेत्रों में भी कुछ अधिक बदलाव दिखाई दिए, जिसे वैज्ञानिक 'प्राचीन' समझते हैं। वे मस्तिष्क के कुछ हिस्सों को 'प्राचीन' कहते हैं, क्योंकि मानव मस्तिष्क हजारों वर्षों के इवोल्यूशन यानी क्रमिक विकास का परिणाम है। समय के साथ निर्मित हुए अरबों न्यूरल पाथवे यानी तंत्रिकाओं के मार्ग नष्ट हुए और एक नया नेटवर्क बना जिसका आज हम मानव इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि कुछ बुजुर्ग लोग टेक्नोलॉजी को समझने लायक वायर्ड नहीं होते, जबकि बच्चे उसमें माहिर हो जाते हैं। मस्तिष्क नई लर्निंग्स को राह देने के लिए पुराने पाथवे नष्ट करता जाता है। 
भाषा को पढ़ने का मतलब है भाषा के देखने-सुनने से संबंधित हिस्सों से शुरुआत करके मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों के बीच बहुत अच्छा तालमेल और संयोजन। यहां तक कि इसमें मोटर एरिया यानी मस्तिष्क के संदेशों को शरीर में विभिन्न स्थान पर पहुंचाने वाले हिस्से भी शामिल होते हैं। इस तरह मस्तिष्क संज्ञान लेने लायक बनता है ताकि वह पढ़कर उसका अर्थ समझ सके। मस्तिष्क में दो मार्ग होते हैं। एक होता है संरचनात्मक तंत्रिका मार्ग, जो कहीं अधिक सिनेप्सेस )तंत्रिकाओं के बीच के जोड़) का बना होता है, जिससे जानकारी के लिए कई नए आयाम खुल जाते हैं। दूसरा होता कामकाजी तंत्रिका मार्ग, जो संरचनागत रूप से तो जुड़ा नहीं होता पर उत्पन्न स्थिति के मुताबिक प्रतिक्रिया देता है। एक दशक तक चला अध्ययन बताता है कि कैसे शिक्षित व्यक्ति की आंखों की गतिशीलता अशिक्षितों के मुकाबले एक सेकंड अधिक पाई गई। यह फर्क बहुत अधिक नहीं दिखाई देता हो लेकिन, ऐसी स्थितियों की कल्पना कीजिए जहां सेकंड से भी कम समय में लिए फैसले बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। 
यही वजह थी कि वह युवती जिसकी शायद मातृभाषा भिन्न थी, जल्दी से 'मसाज' (massage) और मैसेज (message) का फर्क नहीं पकड़ पाई। इसलिए नहीं कि वह पढ़ी-लिखी नहीं थी बल्कि इसलिए कि अंग्रेजी से उसका साबका मेरी तुलना में शायद कम पा था। 
फंडा यह है कि यदि आप सेकंड के एक अंश से भी किसी से आगे रहना चाहते हैं तो आपको बहुत पढ़ने की जरूरत है ताकि आपका मस्तिष्क बार-बार रीवायरिंग करता रहे। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com

साभार: भास्कर समाचार 
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