उमा, हुकमी, मदन और रोशन रोजाना 4 किमी पथरीले और दुर्गम रास्तों से स्कूल जाते हैं। उमा, मदन 11वीं में और हुकमी, रोशन 9वीं क्लास में हैं। उदयपुर के इस 300 की आबादी वाले बागदड़ा गांव के ये पहले ऐसे बच्चे हैं,
जिन्होंने आजादी के 70 साल बाद पांचवीं से आगे की पढ़ाई की है। ऐसा इनके पिता गणेशलाल गमेती की जिद और संघर्ष की वजह से संभव हो सका है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। बागदड़ा गांव, उदयपुर जिला मुख्यालय से करीब 70 किमी दूरी पर बसा है। यहां आने-जाने के लिए चार किमी पहाड़ पर दुर्गम पगडंडियों से होकर गुजरना होता है। इस गांव में अभी तक बिजली है, सड़क, टीवी और ही मोबाइल। पेयजल के लिए महज एक कुआं है। पैदल के अलावा गांव में आवागमन का कोई साधन नहीं है। गांव के इन चार बच्चों के अलावा सभी लोग निरक्षर हैं। कुछ साल पहले यहां पांचवीं तक का स्कूल खुला है, जिसमें गांव के बच्चे पढ़ रहे हैं। पर वे आगे पढ़ाई नहीं कर पाते हैं, क्योंकि बरसात में 2 से 4 महीने नालों के उफान के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं। इन मुसीबतों के बावजूद मजदूरी करने वाले गणेशलाल अपनी दोनों बेटियों और दो बेटों को रोजाना स्कूल पढ़ने भेजते हैं। ताकि ये बच्चे कुछ बनकर गांव की तकदीर बदल सकें। संघर्ष की कहानी बताते-बताते गणेशलाल की आंखें भर आईं। बोले, साहब, बेटियों को इस रास्ते से भेजते हुए मन तो बहुत घबराता है, लेकिन सोचता हूं शिक्षा से ही इस गांव का अंधेरा दूर हो सकता है, इसलिए जोखिम उठा रहा हूं। जब तक बच्चे स्कूल से घर नहीं लौट आते दिल कांपता रहता है। सुनसान इस बीहड़ में चीखने तक की आवाज नहीं सुनाई पड़ती है।' गांव की रोड़ी बाई कहती हैं 'गांव में हालात ऐसे हैं कि बीमार और गर्भवती महिलाओं को खाट पर लिटाकर अस्पताल ले जाना और लाना पड़ता है।' गांव में पहली बार पढ़ने वाली बेटियां उमा और हुकमी का सपना कलेक्टर बनने का है। कहती हैं 'वे सबसे पहले गांव में सड़क बनवाएंगी, ताकि गांव के बच्चे 5वीं के आगे पढ़ सकें।' पहाड़ की ओर इशारा करते हुए कहती हैं 'रोजाना हमें ये संघर्षों का पहाड़ पार करना पड़ता है। स्कूल पहुंचने में दो घंटे लग जाते हैं। बरसात में तो हम स्कूल नहीं जा पाते हैं।'
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साभार: भास्कर समाचार
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