मैनेजमेंट फंडा (एन. रघुरामन)
हमने सुना है कि नई सहस्राब्दी में बच्चे अपने शौक को अपने पैरेंट्स की इच्छा के खिलाफ भी आगे बढ़ाते हैं। लेकिन 1978-80 के दौर में ऐसा नहीं था। वो भी एक ऐसे बच्चे के बारे में जिसने पूरी स्कूलिंग सरकारी स्कूलों में की हो। वो बच्चा किसी मेट्रो शहर से भी नहीं था, जिसे पड़ोसियों के रूप में कभी बॉलीवुड के अमिताभ बच्चन या गूगल के सुंदर पिचाई को देखने का मौका मिला हो। उनके पिता साधारण ज्वेलर थे जो ग्राहकों को बनाए रखने के लिए पेंसिल से नए डिज़ाइन बनाते थे। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के छोटे से गांव बिजलिया में उन्होंने पिता को इसी तरह ड्राइंग करते देखा था। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। उन्होंने देखा कि पिता कागज के टुकड़ों पर ड्राइंग करते थे और फिर उन्होंने भी स्लेट पर ड्राइंग करना शुरू किया। उस दौर में बच्चे स्लेट पर ही ड्रॉ करते थे। 1978 में परिवार उदयपुर गया और बच्चे ने जटिल पेंटिंग करना शुरू किया। उन्होंने मेवाड़, बूंदी, कोटा, नाथद्वारा, मुगल, किशनगढ़, देवगढ़ शैली की पेंटिेंग सीखनी शुरू की। इसी तरह उन्होंने मिनिएचर पेंटिंग करना शुरू किया और पिछले 30 वर्षों से पेंटिंग्स ही उनकी कमाई और जीवन का साधन है। उनके ब्रश के छोटे स्ट्रोक्स ज्वेलरी की बारीक डिटेल्स, पेड़ों की पत्तियों, मोर के पंखाें, स्मारकों की गोलाई, देवी-देवताओं की आंखों की पुतलियों पर चलते रहे। उदयपुर का उनका तीन मंजिला घर और आर्ट एक्सिबिशन सेंटर कई आंत्रप्रेन्योर को आकर्षित करता है। वे अपने काम में इतने परफेक्ट थे कि नेशनल आर्ट गैलरी ने उन्हें राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स को सहेजने का काम सौंपा। आज तक कई बड़े पेंटर्स की करीब 5000 पेंटिंग्स वे सहेज चुके हैं, जो बहुत ही बुरी स्थिति में थीं।
सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट बल्कि महाराणा उदयपुर सहित कई राज परिवार और उच्च वर्ग के लोग उनके काम को पसंद करते हैं। अमिताभ बच्चन ने अपनी मां तेजी बच्चन की एक पेंटिंग उनसे बनवाई थी। यह पेंटिंग देखकर अमिताभ ने कहा था- ऐसा लग रहा है जैसे मां मेरे सामने बैठी हों। कई राष्ट्रीय पुरस्कारों के विजेता ओम प्रकाश बिजालिया की पेंटिंग्स उनके लिए प्रोफशन नहीं है। यह पैशन है, जिससे देश के कई नए आर्टिस्ट प्रेरणा लेते हैं।
स्टोरी 2: सात साल पहले सौम्या शिनॉय क्रास्टा ने सायकोलॉजिकल काउंसलिंग में मास्टर्स की डिग्री ली थी। इन्फोसिस में उन्होंने एचआर में जॉब किया। नीति शांताकुमार ने यूके से एमबीए किया और एक टेलिकॉम कंपनी के साथ इंटर्नशिप कर रही थीं। वे दोनों ही कुछ अलग करना चाहती थीं और यही समानता दोनों को साथ ले आईं। दोनों को ही अपने कॉलेज में इवेंट आयोजित करने का कुछ अनुभव था और दोनों ही परम्परागत सुरक्षित जॉब नहीं करना चाहती थीं। टर्निंग पॉइंट तब आया जब सौम्या अपनी ही शादी की प्लानिंग कर रही थीं। उनकी यह जानने में भी दिलचस्पी हुई कि इस बीच साथ-साथ परदे के पीछे क्या चल रहा है। दोनों ने महसूस किया कि नई जनरेशन की वेडिंग इंड्रस्ट्री और आगे बढ़ रही है। कपल्स, उनके परिवार और प्लानर्स के बीच सभी चीजों को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए पार्टनरशिप की जरूरत है। उनकी प्ररेणा थी 2001 में प्रदर्शित जेनिफर लोपेज की हॉलीवुड मूवी, वेडिंग प्लानर। 2010 में दोनों ने अपनी कंपनी पर्पल रिंग्स शुरू की और उसी साल बॉलीवुड फिल्म 'बैंड बाजा बारात' प्रदर्शित हुई थी। इसने उनके विचार को और पुख्ता किया। पिछले सात वर्षों से सौम्या डिज़ाइन और ऑपरेशन का काम देख रही हैं और नीति सेल्स और मार्केटिंग की इंचार्ज हैं। पर्पल रिंग्स देशभर में डेस्टिनेशन वेडिंग और ग्रीन वेडिंग्स कर रही हैं, जिसमें प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध होता है।
फंडा यह है कि रास्ते बदलिए, नया कीजिए लेकिन, सुनिश्चित कीजिए कि उस पर डटे रहकर खुद को चट्टान की तरह स्थापित करेंगे।
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साभार: भास्कर समाचार
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