Wednesday, June 14, 2017

मैनेजमेंट: दुनिया को शिक्षित बनाने के लिए मिसाल होना जरूरी

एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)

मार्केटिंग में मुफ्त नमूने देना पुराना तरीका है। कुकीज़ से लेकर शैंपू के पाउच तक बड़े जनरल स्टोर्स पर बंटते हुए देखे जा सकते हैं। हमने छोटे परफ्यूम के टेस्ट ट्यूब भी एयरलाइंस में एयर होस्टेस को लंबी यात्राओं में बांटते देखा है। सैंपल से सामान और सेवा के प्रति जागरूकता आती है, लेकिन सैंपल का इस्तेमाल करने वाले सिर्फ 25 प्रतिशत ही ग्राहक के रूप में बदल पाते हैं। लेकिन शिक्षा के मामले में सैंपलिंग मुश्किल काम है, क्योंकि शिक्षा लेने वाले का रिजल्ट तक पहुंचना लंबी प्रक्रिया है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। इसलिए कई एजुकेशन आंत्रप्रेन्योर टूर आयोजित करते हैं और इन्फ्रास्ट्रक्चर, कैंटिन सुविधा, खेलकूद के साधन और होस्टल सुविधा का सैंपल संभावित छात्रों और उनके पैरेंट्स को इस उम्मीद में भेजते हैं कि कुछ प्रतिशत तो लौटकर आएगा। बच्चे बाद में उनके स्कूल या यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेंगे। लेकिन दिल को छू लेने वाली एक कहानी है, जो बताती है कि शिक्षा अपनेआप में सैंपल है। 
निशा अाज 21 साल की हैं। उसके पिता राजिया एक चर्मकार थे और मां गीता देवी धर्मशाला में एक टूरिस्ट स्पॉट के पास सड़क किनारे चाय की दुकान चलाती थीं। पूरे परिवार के लिए शिक्षा का कोई खास महत्व नहीं था। आज निशा बेंगलुरू के क्राइस्ट कॉलेज में मीडिया, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं। पिंकी 17 साल की हैं और हाल ही में उसने 12वीं की परीक्षा पास की है। वह डॉक्टर बनना चाहती है और पीएमटी की कोचिंग कर रही है, जबकि उसके माता-पिता दोनों दिहाड़ी पर काम करते हैं। वे भी धर्मशाला से है और उसके परिवार में भी पढ़ाई कभी प्राथमिकता में नहीं रही। निशा और पिंकी ने ही शिक्षा का स्वाद नहीं चखा है। इनके अलावा 107 और छात्र हैं, जिनमें से अधिकतर धर्मशाला में कचरा पेटियों के आसपास बिखरे सामान में से कुछ बिनकर खाते हैं। ये गरीब और भिखारियों और कचरा बीनने वालों के परिवार से हैं। इसकी शुरुअात कुछ साल पहले एक ऐसे शख्स ने की थी, जिसे आज भी भारत में शरणार्थी का दर्जा हासिल है। उन्होंने इन बच्चों के पेरेंट्स को 150 रुपए प्रतिमाह देकर अपने आश्रम में आने के लिए राजी किया था। यह राशि इस आकलन के बाद तय की गई थी कि बच्चे कचरा बीनकर या भीख मांगकर परिवारों की कितनी आर्थिक मदद कर पाते होंगे। 1977 में 24 साल की उम्र का वे युवा दलाई लामा से मिलने तिब्बत से भागकर भारत आए थे। उनसे मिलने के बाद वे धर्म की शिक्षा के लिए चले गए। बाद में जब धर्मशाला लौटकर आए तो देखा कि कुछ छोटे भिखारी उनका पीछा कर रहे हैं। उन्होंने देखा कि ये बच्चे कचरे में से उठाकर कुछ भी खा लेते हैं। भीतर से आवाज आई कि ये लोग एेसे ही रहे तो ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाएंगे। 
इस तरह दलाई लामा की वित्तीय और अन्य मदद से लॉबसांग जामयांग ने टांग लेन चैरिटेबल ट्रस्ट शुरू किया। आज उन्हें गरीबों का साधु, तारणहार, कचरा बीनने वालों और भिखारियों के भगवान के नाम से जाना जाता है। पहले उन्होंने इन गरीब बच्चों को खाना, जगह और सेहत दी। फिर दयानंद मॉडल सीनियर स्कूल से बात की, जो उनके बच्चों को किसी भी क्लास में ले लेता है। एक पहाड़ी के शांत कोने पर बना टांग लेन परिसर कांगड़ा-पठानकोट नेशनल हाईवे से 10 किलोमीटर दूर स्थित है। दुनियाभर की कई कंपनियों के स्वयंसेवी यहां गंदी बस्ती के बच्चों को साफ-सफाई, खान-पान और रहन-सहन की आदतें सिखाते हैं। तब यहां शुरुआत करने वाले अधिकतर बच्चे आज ग्रेजुएशन करने वाले हैं। और इसकी शुरुआत हुई थी तब जब एक साधु ने बच्चों को शिक्षा के महत्व का नमूना दिखाया था। उसने उनके माता-पिता को तथाकथित कमाई का भुगतान कर सैंपल दिया था। 
फंडा यह है कि दुनिया को अधिक शिक्षित बनाने के लिए हमें शिक्षा के नमूने को किसी किसी रूप में आगे बढ़ाना होगा। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com


साभार: भास्कर समाचार 
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