गुड़गांव, फरीदाबाद, सोनीपत, रेवाड़ी समेत पूरे हरियाणा में सेक्टर, कॉलोनी और कॉम्पलेक्स बनाने वाली डीएलफ, ओमेक्स, यूनिटेक और पार्श्वनाथ जैसी 291 रीयल स्टेट कंपनियां सरकार के 7006 करोड़ रुपए डकार
गई हैं। ये वो पैसा है जो उपभोक्ताओं से विकास के नाम पर वसूला गया और उसका कुछ हिस्सा सरकार के पास जाता है। लेकिन ये कंपनियां सरकार का हिस्सा दबा गईं। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। हरियाणा में ग्रुप हाउसिंग, सेक्टर और कॉलोनी बसाने के लिए लाइसेंस लेने की एवज में निर्धारित एक्सट्रा डेवलपमेंट चार्ज (ईडीसी) और इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चार्ज (आईडीसी) सरकार को देना होता है। वर्ष 2005 से अप्रैल 2017 के बीच की ईडीसी और आईडीसी की यह राशि बिल्डरों पर बकाया है। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने इसकी लिस्ट तैयार की है। पानीपत नगर योजनाकार अरविंद्र ढुल ने बताया कि सरकार अब इनसे राशि वसूलने की तैयारी कर रही है।
ये हैं टॉप 15 बकायादार कंपनी:
- यूनिटेकलिमिटेड- 88300.83 लाख रुपए
- कंट्रीवाइड प्रमोटर- 85871.67 लाख रुपए
- ईरिओ एसयू- 52588.53 लाख रुपए
- वटिका लिमिटेड- 45430.25 लाख रुपए
- पार्श्वनाथ डेवलपर- 43378.68 लाख रुपए
- अंसल एपीआई- 38956.58 लाख रुपए
- एंबियंस - 27715.17 लाख रुपए
- रहेजा डेवलपर- 28517.11 लाख रुपए
- टीडीआई- 27708.28 लाख रुपए
- एएंडडी इस्टेट प्रा. लिमिटेड- 21508.80 लाख रुपए
- विपुल इन्फ्रास्ट्रक्चर- 20134.39 लाख रुपए
- कृष - 18929.55 लाख रुपए
- ओमेक्स लिमिटेड- 18201.87 लाख रुपए
- डीएलएफ लिमिटेड- 17626.46 लाख रुपए
- लोटस इंफ्रास्ट्रक्चर -16507.33 लाख रुपए
रीयल एस्टेट कारोबार में 12 साल पहले शुरू हुआ था बूम: हरियाणा में वर्ष 2005 से रीयल एस्टेट कारोबार का बूम शुरू हुआ। इस दौरान गुड़गांव, फरीदाबाद, सोनीपत, रोहतक, बहादुरगढ़, रेवाड़ी, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, अम्बाला, यमुनानगर, सोहना, पंचकूला सहित कई शहरों में कॉलोनी, सेक्टर और कॉम्पलेक्स विकसित किए गए। बड़ी रीयल एस्टेट कंपनियों के साथ कई छोटी फर्म ने भी सरकार से लाइसेंस लिए और कॉलोनियां विकसित की। इन कंपनियों ने उपभोक्ताओं डेवलपमेंट चार्ज के नाम से वसूले पैसे।
फरवरी में हाईकोर्ट ने मांगा था सरकार से जवाब: इसी साल फरवरी माह में गुड़गांव में घंटों जाम लगा। इस मसले को लेकर शहर के लोग हाईकोर्ट पहुंचे और करोड़ों रुपए ईडीसी चार्ज वसूलने के बावजूद सुविधाएं मिलने की याचिका दायर की। ईडीसी के रूप में सरकार द्वारा 15 सालों में खर्च किए गए 16 हजार करोड़ के ब्यौरे पर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पूछा इतनी बड़ी राशि कहां खर्च की गई? क्यों इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि इस राशि के सही खर्च पर दुनिया की बेस्ट सिटी बन जाती, लेकिन यहां तो लोग मूल-भूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
जमीन गिरवी रखने का भी दिया था मौका: सरकार ने पिछले साल नई लाइसेंस नीति लागू की थी। ईडीसी दरें निर्धारित में भी संशोधन किया। अब यह दर विभिन्न शहरों की क्षमताओं एवं आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित की जाती है। ईडीसी और आईडीसी की वसूली सुनिश्चित करने के लिए नई नीति लागू की। इसके तहत सरकार लाइसेंस धारक की जमीन को गिरवी रख सकती है। बशर्ते भूमि सभी ऋणों से मुक्त हो। इससे कॉलोनाइजर को अपनी परियोजना पूरी करने के लिए वित्तीय छूट मिल सकती है। हालांकि बकाया राशि पर यह अभी कहीं लागू हुई नजर नहीं आई है।
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साभार: भास्कर समाचार
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