Monday, June 12, 2017

Life Management: किसी मुद्‌दे पर गहराई से महसूस करें तो उसके 'चेंज एजेंट' बनें

मैनेजमेंट फंडा (एन. रघुरामन)
हम मेंसे कई लोगों ने वह फिल्म जरूर देखी होगी, जिसमें अक्षय कुमार एक व्यक्ति- जो पहले ही मर चुका है- को स्ट्रेचर पर लेकर अस्पताल की ओर दौड़ते हैं और डॉक्टरों से उसे बचाने की गुजारिश करते हैं। डॉक्टर उस
व्यक्ति का मुआयना करते हैं, उसे मृत पाते हैं लेकिन, फिर भी वे 'इलाज' शुरू करते हैं और अक्षय कुमार से विशेषज्ञ डॉक्टर की सेवा के लिए दो लाख रुपए मांगते हैं। कई घंटों के इस नाटक के बाद वे अक्षय कुमार को बताते हैं कि मरीज को बचाया नहीं जा सका। आखिर में हमारा हीरो चिकित्सा जैसे अच्छे पेश में व्याप्त भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करता है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। चाहे यह घटनाक्रम अतिशयोक्तिपूर्ण लगता हो लेकिन, इससे लोगों के मन में खतरे की घंटी तो बजेगी ही। हम सुनते भी हैं कि कैसे अस्पताल चिकित्सकीय रूप से मृत व्यक्ति को वेंटीलेटर पर 'जिंदा' रखते हैं- या तो पैसे की खातिर या परिवार के सदस्यों के दबाव में। फिल्म में दिखाए अनुसार अस्पताल की फार्मेसी से महंगी दवाएं और डिस्पोजेबल चीजें मंगवाना तो आम है। बहुत समय नहीं हुआ जब अभिनेता आमिर खान ने अपने टेली-सीरियल 'सत्यमेव जयते' में डॉक्टरों और रोगियों के वास्तविक जिंदगी से लिए अनुभव दिखाकर इन बातों की पुष्टि की थी। अक्षय और आमिर के दिखाए दृश्य चर्चा का विषय तो बने लेकिन, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि इसके पीछे बहुत शक्तिशाली लॉबी काम कर रही है। इससे जुड़े सभी पक्षों के इसमें भारी आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। 
पिछले हफ्ते मैं मुंबई के पवई स्थित हीरानंदानी अस्पताल गया था और किडनी घोटाले के लिए खबरों में रहे इस अस्पताल में मैंने बड़ा परिवर्तन देखा। लॉबी में एक बड़े से स्क्रीन पर अस्पताल में भर्ती ऐसे रोगियों की सूची दिखाई गई थी, जिन्होंने बीमा कराया हुआ था और संबंधित बीमा कंपनियों से इलाज के खर्च का दावा किया हुआ था। इस 'लाइव' स्क्रीन पर किए गए दावे की मिनट-मिनट की जानकारी दी जा रही थी जैसे 'बीमा दावे की राशि मंजूर (रकम सहित)' या 'नामंजूर' अथवा 'प्रक्रिया चल रही है।' जाहिर है किडनी घोटाले ने अस्पताल को अपनी कार्यप्रणाली में कहीं तो पारदर्शिता लाने पर मजबूर कर दिया था। मेरे दिमाग में आया कि स्क्रीन पर बेड की उपलब्धता, किसी भी बीमारी के इलाज का औसत खर्च, सामान्य डिलीवरी और सीज़ेरियन डिलेवरी के खर्च की तुलना का चार्ट आदि भी तो दिखाया जा सकता है। मुझे लगा कि इससे मेडिकल पेशे को लेकर अस्पताल के साफ-सुथरे रवैए का परिचय मिलेगा। मैं जब अपना यह विचार अस्पताल में हृदय रोग के इलाज के लिए भर्ती मित्र को बता रहा था तो उसने बताया कि मुंबई में पहले ही एक एक्टिविस्ट इसी पर काम कर रही हंै और फिर मित्र ने उनकी कहानी सुनाई। 
सुबर्णा घोष पर बरसों पहले सीज़ेरियन डिलेवरी थोप दी गई थी लेकिन, वे भाग्य को दोष देकर बैठने वालों में से नहीं थीं। यह दर्दनाक अनुभव उन्हें लंबे समय तक परेशान करता रहा और फिर उन्होंने उन गर्भवती महिलाओं के मामले उठाने का निश्चय किया, जिन्हें सामान्य डिलेवरी का मौका नहीं दिया गया। यदि आप उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में सीज़ेरियन डिलेवरी सभी चिकित्सा संस्थानों में बहुत ज्यादा हो रही हैं, फिर चाहे अस्पताल निजी हो या सरकारी। 
जब वे मुंबई की एसएनडीटी यूनिवर्सिटी के महिला अध्ययन केंद्र से बच्चे को जन्म देते समय महिलाओं को होने वाले अनुभव पर डॉक्टोरल रिसर्च कर रही थीं तो उन्होंने कई महिलाओं से चर्चा की और उनके अनुभवों ने उन्हें उतना ही गुस्सा दिला दिया जितना उस फिल्म में अक्षय कुमार ने दिखाया था। उन्होंने जिन महिलाओं से चर्चा की उनमें से ज्यादातर सीज़ेरियन डिलेवरी नहीं चाहती थीं। वैसे भी कौन अनावश्यक पीड़ा से गुजरना चाहेगा। 
सुबर्णा ने ऐसी महिलाओं को 'बर्थ इंडिया' के झंडे तले एकत्र किया, जिन्हें लगता था कि उनके शरीर पर मेडिकल तरीके से दखल देकर जन्म देने के उनके अधिकार का उल्लंघन किया गया है। इस संगठन के जरिये उन्होंने इन महिलाओं के गर्भवती होने के अधिकार, बच्चे को जन्म देने के अधिकार और कुल-मिलाकर प्रजनन संबंधी सारे अधिकारों को आवाज दी। एक जागरूकता अभियान शुरू किया गया र सरकार से मांग की गई कि सारे अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य बनाया जाए कि वे वहां होने वाली सीज़ेरियन सामान्य डिलेवरी के आंकड़ें प्रदर्शित करें। स्वास्थ्य मंत्रालय ने अभी संगठन की इस मांग पर कोई जवाब नहीं दिया है लेकिन, 'बर्थ इंडिया' अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है। 
फंडा यह है कि यदिकिसी मुद्‌दे पर कोई गहरा अहसास रखते हैं तो आप उस मामले में बदलाव के वाहक बन जाएं। कम से कम वह परिवर्तन लाने की कोशिश तो करें, जो आपको लगता है कि सही है। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com

साभार: भास्कर समाचार 
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