Wednesday, June 14, 2017

बारहवीं का टॉपर आईआईटी कोचिंग छोड़कर कोटा से लौटा, श्रम कार्ड होने से नहीं मिली सरकारी मदद, बेच रहा सब्जी

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का धावेंद्र कुमार। आपके जेहन में शायद यह नाम होगा, क्योंकि इस होनहार ने इसी साल बारहवीं में 98 फीसदी अंक लाकर पूरे प्रदेश में टॉप किया था। सपना था कि आईआईटी कर इंजीनियर
बनूंगा... सो कोचिंग करने के लिए कोटा चला गया। धावेंद्र का उत्साह तब काफूर हो गया, जब उसे महज हफ्तेभर में कोचिंग छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा। दरअसल, श्रम कार्ड होने के कारण उसे सरकार से मिलने वाले एक लाख रुपए भी नहीं मिले। अब वह गांव में सब्जियां बेचकर अपनी मां को मदद कर रहा है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। राजधानी से 90 किलोमीटर दूर बालोद के लोंडी निवासी धावेंद्र ने इस साल बारहवीं में पूरे प्रदेश में सबसे अधिक अंक हासिल कर पूरे प्रदेश में नाम कमाया। पोंडी में उसके स्कूल के टीचर और छात्र उसकी प्रतिभा से खुश है। लेकिन धावेंद्र का सपना पूरा होने में गरीबी सबसे बड़ी बाधा बन खड़ी हुई। भास्कर से बात करते हुए धावेंद्र भावुक हो उठा, कहा- मेरा टॉप आना भी करियर बनाने में मदद नहीं कर पा रहा है, क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं हैं। धावेंद्र की मां सब्जियां बेचकर घर का खर्च चलाती हैं। अब वह इसी काम में मदद कर रहा है। सब्जी बेचने से लेकर लाना-ले जाना उसका काम है। खपरी में रहने वाला उसका दोस्त चंद्रमणी कोटा में आईआईटी की तैयारी कर रहा है। धावेंद्र कोटा गया तो उसी के पास आसरा मिला। वहां फीस रहने-खाने का खर्च करीब एक लाख रुपए रहा था। यह रकम जुटाना उसके परिवार की बस की बात नहीं थी। यही मजबूरी उसे वापस गांव खींच लाई। टॉपर धावेंद्र ने बालोद जिला प्रशासन के अफसरों से कोटा जाने के लिए 50 हजार रुपए की मदद मांगी थी। कलेक्टर ने हफ्तेभर में पैसे देने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन महीना गुजर गया, पैसे मिले ही नहीं। धावेंद्र की चाहत है कि सरकार उसे किसी तरह इंजीनियर बनने में मदद कर दे। 
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साभार: भास्कर समाचार 
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