Saturday, June 10, 2017

भारत-पाक बने एससीओ के सदस्य; जानिए किसे क्या फायदा होगा, क्या नुकसान

भारत और पाकिस्तान को शुक्रवार को शंघाई को-ऑपरेशन आर्गनाइजेशन (एससीओ) की पूर्ण सदस्यता मिल गई। पहले दोनों को संगठन में पर्यवेक्षक देश का दर्जा प्राप्त था। पाक ने खुद को आतंक से पीड़ित देश बताया।
इस बैठक से इतर पीएम मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, कश्मीर मुद्दे पर भारत-पाक के बीच का तनाव एससीओ और इसके एंटी टेरेरिज्म मैकेनिज्म की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यह तनाव एससीओ के मंच पर भी उछलेगा। इससे ग्रुप की एकता खंडित होगी।  
भारत के लिए इस सदस्यता के क्या मायने हैं? 
एससीओ का मकसद मध्य एशिया की सुरक्षा और आपस में सहयोग बढ़ाना है। इस संगठन के आठ स्थाई सदस्य देशों में रूस और चीन के बाद भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ऐसे में इस क्षेत्र में आर्थिक, कूटनीतिक और आतंकवाद के खिलाफ बड़ा मंच मिला है। 
क्या चीन-रूस के रहते आर्थिक फायदा होगा? 
इसके अधिकांश पूर्ण सदस्य देशों के पास ऊर्जा के बड़े भंडार है। इससे भारत को फायदा होगा। मेजबान कजाकिस्तान भारत को यूरेनियम का सबसे बड़ा सप्लायर है। इसके अलावा यहां के बाजारों में भारत की एंट्री आसान हो जाएगी। 
पाक के रहते आतंक पर बातचीत हो पाएगी?
आतंकवाद से लड़ने के लिए एससीओ का अपना मैकेनिज्म है। संगठन का अपना एंटी टेरर चार्टर है। ऐसे में भारत एससीओ के मंच पर पाकिस्तान की आतंकी नीतियों को प्रभावी ढंग से रख सकता है। 
चीन-पाकिस्तान की दोस्ती और मजबूत होगी ?
भारत-पाक दोनों इसके सदस्य हैं। ऐसे में चीन के लिए सदस्य देशों की भावनाओं को नजरअंदाज कर पाकिस्तान का हिमायती बने रहना आसान नहीं होगा। जबकि, भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को उठाकर अपने आप को एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर पेश कर पाएगा। 
एससीओ देशों के बीच कनेक्टिविटी परियोजनाओं में सहयोग भारत की प्राथमिकता है। पर संप्रभुता-क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं होना चाहिए। -नरेंद्रमोदी, प्रधानमंत्री (वन रोड वन बेल्ट पर चीन को जवाब) 
  • एससीओ के सदस्य देशों की आबादी दुनिया की आबादी का 25% और जीडीपी 20% के करीब है। यह संगठन यूएन महासभा में पर्यवेक्षक भी है। 
  • 2005 में अस्ताना में भारत, ईरान, मंगोलिया और पाक के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया। भारत ने सदस्यता के लिए 2014 में अप्लाई किया था। 
  • 1996 में शंघाई फाइव बना। चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान जुड़े। 2001 में उज्बेकिस्तान के जुड़ने से शंघाई सहयोग संगठन नाम पड़ा। 
पाक प्रायोजित आतंकवाद से कैसे निपटेगा भारत: भारत इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल पाकिस्तान को अलग-थलग करने में कर सकता है। वह इस मंच पर पाकिस्तान की करतूतों का सबूत दे सकता है। सदस्य देशों के बीच सबूत पेश किए जाने पर चीन भी पाकिस्तान का पक्ष लेने से हिचकिचाएगा। भारत से जुड़ने से संगठन का दायरा बड़ा हो गया है। आतंकवाद पर चीन और रूस भी कहीं कहीं पीड़ित हैं। ऐसे में इस मसले पर भारत को रूस का समर्थन मिलना तय है। भारत-रूस का अापसी सहयोग भी बढ़ेगा। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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