मैनेजमेंट फंडा (एन. रघुरामन)
किसी शांत से कैफे में आप कानों में आसपास की आवाजें आने से रोक नहीं सकते, जब तक कि दिमाग को स्विचऑफ कर दिया हो। एफबीआई से बर्खास्त निदेशक जेम्स कॉमी के साथ अमेरिकी सीनेट के सवाल-जवाब
गुरुवार की शाम मैं ध्यान से सुन रहा था। पास की टेबल से दो एक्जिक्यूटिव का जोक मेरे कानों में पड़ा। उन्होंने कहा, मैं कॉमी जैसे इंटरनेशनल मामलों में फैसला करता हूं और घरेलू मामले पत्नी पर छोड़ दिए हैं। इस तरह घर में समरसता बनी रहती है। यह एक तरह से महिलाओं का अपमान था। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। मैं उठा और उनसे दो कहानियां साझा कीं, जो मैंने हाल ही में पढ़ी थी कि कैसे भारतीय महिलाएं राष्ट्रीय नीतियों में भी भूमिका निभा रही हैं। दोनों शख्स इसके बाद एक शब्द कहे बिना चुपचाप चले गए। कहानियां ये हैं।
वे दोनों दिल्ली में रहती हैं, लेकिन एक-दूसरे को पहचानती नहीं हैं। दोनों सिंगल पैरेंट थे। दोनों को कुछ आपत्तियां थीं, जिसमें उनके पति के नाम का मु्द्दा भी था। सबसे बड़ी समानता यह है कि दोनों ने कभी नहीं कहा, 'मुझे नहीं मालूम की इस समस्या का समाधान कैसे करू़ं'। वे सामान्य हैं लेकिन फिर भी दोनों सत्ता के गलियारों में मौजूद लोगों को समझाने में सफल रहीं और समय के अनुसार परिवर्तन ला पाईं। मोनिका सिर्फ 26 सााल की हैं और सात आठ साल के बच्चों की मां है। पति से अलग होने के बाद यह युवा मां अकेले ही सब कुछ मैनेज करती है। लेकिन वे एक जगह आकर अटक गईं, जब दिल्ली के पिथमपुरा के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के ऑफिस ने उनके बच्चों के अनुसूचित जाति के सर्टिफिकेट का आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया कि प्रमाण-पत्र सिर्फ पिता के नाम से जारी किया जा सकता है, मां के नाम से नहीं। आपसी सहमति से अलग होने के बाद मोनिका इस बात पर अडिग थीं कि वे अपने पूर्व पति की कोई मदद नहीं लेंगी। वे दिल्ली के कैबिनेट मंत्री सत्येन्द्र जैन से मिलीं और उन्हें परिस्थिति बताई, लेकिन इससे कोई नतीजा नहीं निकला। उनके पास तो जाति प्रमाण-पत्र था, लेकिन बच्चों को सर्टिफिकेट नहीं दिया गया। फिर उन्होंने अपनी समस्या महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी को ट्वीट कर बताई। एक सप्ताह के भीतर ही सकारात्मक जवाब मिला कि मुद्दे को महिलाओं के लिए राष्ट्रीय नीति के प्रस्ताव में शामिल किया जाएगा। उनका यह प्रयास असल में उन हजारों मांओं की मदद करेगा, जिन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है और जो नागरिकता के नाते मिले अधिकारों के लिए लड़ रही हैं।
लेकिन 45 साल की प्रियंका की बेटी की उम्र तो करीब-करीब मोनिका के बराबर है। वे अपनी बेटी का पासपोर्ट लंबे समय से इसलिए नहीं बनवा रही थीं, दोनों को ही ट्रेवल दस्तावेज में पति का नाम दर्ज कराने पर आपत्ति थी। पति ने उन्हें बेटी के जन्म के समय ही छोड़ दिया था। लेकिन दो साल पहले जब उनकी बेटी ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया तो उनपर पिता का नाम लिखने के लिए दबाव था, क्योंकि तब यह कानून जरूरी था। लेकिन बेटी पिता का नाम दस्तावेज में देखकर काफी दुखी थी। वे पिता के नाम को दस्तावेज से हटवाने के लिए कोर्ट तक गईं। 2016 में प्रियंका ने चेंज डॉट ओआरजी पर एक पीटिशन शुरू की और यह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी तक पहुंची। वहां से जवाब आया कि वे इसे बदलने पर का काम कर रहे हैं। इस याचिका को पूरी दुनिया से अच्छी प्रतिक्रिया मिली। नतीजा यह हुआ कि अब संशोधित गाइडलाइन में बच्चे के पासपोर्ट पर सेल्फ डिक्लेरेशन देने पर सिर्फ मां का नाम देने का प्रावधान भी है।
फंडा यह है कि पढ़े-लिखे लोगों से समस्याओं पर सिर्फ मजाक करने और खेद जताने की नहीं, तार्किक समाधान की उम्मीद होती है।
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साभार: भास्कर समाचार
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