Sunday, April 30, 2017

शराब के कारण इन तीन गांवों में 40 वर्ष से ज्यादा नहीं जी पा रहे हैं लोग

तीन साल पहले रामू के हाथ-पैर में अचानक सूजन गई थी। घबराए परिवार वालों ने उसे डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि उसका लिवर लगभग खराब हो चुका है। पैसे नहीं थे इसलिए बेहतर इलाज भी नहीं हो पाया। भयंकर पीड़ा और संघर्ष के बाद मात्र 32 साल की उम्र में पिछले वर्ष रामू की मौत हो गई। इसका कारण था गांव में बनी हुई महुआ शराब पीना।
 यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। रामू जैसी ही कहानी और दर्द पाकुड़ जिले के तीन गांव बलामी, मडगामा और मामामोड़ के कई परिवारों का है। इन गांव के लोगों को महुआ शराब की ऐसी आदत है कि यहां के लोगों की औसत आयु 40 साल ही रह गई है। जबकि देशभर में पिछले पांच सालों में औसत आयु पांच साल बढ़ी है। इन तीनों गांवों में ज्यादातर पहाड़िया जनजाति के लोग रहते हैं। इनके करीब 60 घर हैं। इनमें 180 परिवार रहते हैं। यहां 30 वर्ष के बाद महिला-पुरुष बेहद कमजोर और बूढ़े नजर आने लगते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेनिंग एंड मैनेजमेंट, रांची ने अपने शोध में इनकी औसत उम्र कम होने का खुलासा किया है। इसने 2016 में इस संबंध में एक रिपोर्ट जारी की थी। वर्ष 2001 में इनकी आबादी 61,121 थी, जो 2011 तक 24.38% गिरकर 46,222 रह गई। यानी आबादी 14,899 कम हो गई। इसका मुख्य कारण है महुआ से बनी शराब। इसी संस्थान ने यह भी बताया कि इनकी औसत उम्र अब 40 वर्ष हो गई है। जबकि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार देश में पुरुषों-महिलाओं की औसत आयु में पांच वर्ष की वृद्धि हुई है। 2011-2015 के बीच पुरुषों की उम्र बढ़कर 67.3 और महिलाओं की 69.6 वर्ष हो गई है।
इनतीनों ही गांव में लोगों के पास एक मात्र काम है महुआ चुनना, शराब बनाना और बाजार में बेचना और खुद पीना। इन गांवों में 10-12 साल के बच्चे भी शराब पीने लगते है। गौरतलब है कि ये तीनों गांव सिंघारसी एयरबेस से सटे हुए हैं। बलामी गांव के मुखिया कामेश्वर पहाड़िया कहते हैं कि इन तीनों गांवों में किसी भी तरह की सरकारी व्यवस्था सही तरीके से संचालित नहीं होती। ज्यादातर लोग महुआ चुनकर उससे शराब बनाते हैं। हर घर में यह शराब पीने वाले लोग हैं। शराब की वजह से अधिकतर लोग 50 साल से पहले मर जाते हैं। सरकार ने यहां की खराब स्थिति देखते हुए इन तीनों गांव में इस वर्ष 50 हजार फलदार पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा है। यही नहीं 4 सखी मंडल बनाकर पत्तल, टोकरी, सूप, डलिया बनाने की भी ट्रेनिंग दी जा रही है। गांव की इस बदहाल तस्वीर के सामने आने की भी एक कहानी है। दरअसल गांव वले अक्सर महुआ के पेड़ के नीचे आग लगा देते थे ताकि पका हुआ महुआ आग के कारण नीचे गिर जाए। ऐसे में काफी धुआं हो जाता था। एयरबेस पर तैनात कर्मचारियों को इससे परेशानी होती थी। ऐसे में एयरबेस के अधिकारियों ने गांव जाकर ग्रामीणों से बातचीत की तो यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ। लेकिन समझाने के बावजूद जब यह सिलसिला नहीं रुका तो अधिकारियों ने गांव वालों की शिकायत राज्य सरकार से कर दी थी। इसके बाद ही सरकार ने गांव में शोध करने को कहा था। हालांकि कई बार समझाने और काफी प्रयास करने के बावजूद गांव की स्थिति नहीं सुधरी है। सिंघारसी एयरबेस के ग्रुप कैप्टन आर. साहू बताते हैं कि मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को यहां की समस्याएं बताई गई हैं। उनसे कहा गया था कि महुआ शराब से खराब हो रहे युवाओं को बचाने के लिए कुछ करें। इसके बाद उन्होंने टीम भेजी थी। टीम ने तीनों गांवों का दौरा किया था। 
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साभार: भास्कर समाचार 
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