हायर स्टडी काफी महंगी होने के
चलते ज्यादातर छात्रों का सहारा एजुकेशन लोन रह जाता है। बैंकों द्वारा
एजुकेशन लोन देने की प्रक्रिया भी आसान करने से लोन लेने वालों की संख्या
भी बढ़ी है। एजुकेशन लोन आसान होने से जहां हायर स्टडी करना आसान हुआ है,
वहीं लोन डिफाल्टर की संख्या भी बढ़ी है। इसकी वजह लोन की अवधि पूरी होने
के बाद नौकरी नहीं मिलना है, जिससे ईएमआई चुकाना मुश्किल हो जाता है।
सिबिल स्कोर होता है खराब: पर्सनल लोन की तरह एजुकेशन लोन की ईएमआई लोन लेने के बाद शुरू नहीं
होता है। बल्कि, एजुकेशन लोन की ईएमआई स्टडी पीरियड के छह महीने या एक साल
बाद या नौकरी लगने के बाद शुरू होती है। अगर, इसके बावजूद लोन लेने वाला
छात्र लोन की ईएमआई अदा नहीं करता है तो उसका क्रेडिट स्कोर खराब हो जाता
है। इससे बचने के लिए लोन की ईएमआई शुरू होने से पहले तीन या चार ईएमआई का
पैसा इक्ट्ठा कर के रखना बेहतर होता है।
गारंटर भी होता है प्रभावित: एजुकेशन लोन की ईएमआई का भुगतान नहीं करने पर लोन दिलाने वाले गारंटर
का भी सिबिल स्कोर खराब हो जाता है। इसलिए, एजुकेशन लोन का गारंटर बनने से
पहले यह जान लेना बेहतर होता है कि सामने वाले की माली हालत भविष्य में
कैसी रहेगी। अगर, उसको नौकरी नहीं मिल पाती है तो उसके पास लोन चुकाने के
लिए क्या ऑप्शन हैं। अगर, लोन लेने वाला छात्र लोन नहीं चुकाता है तो
गारंटर का सिबिल स्कोर भी खराब हो जाता है। गारंटर का सिबिल स्कोर खराब
होने पर उसको भी लोन लेने में दिक्कत आती है।
बचने के उपाय: अगर, छात्र ने एजुकेशन लोन 5 या 7 साल की अवधि के लिए लिया है और इस
अवधि को पूरी होने के बाद भी लोन की ईएमआई चुकाने में सक्षम नहीं है तो लोन
की अवधि बढ़ाने के लिए वह बैंक में आवेदन कर सकता है। बैंक छात्र के आवेदन
पर लोन की अवधि को बढ़ा देता है। उदाहरण के तौर पर एक छात्र ने 5 लाख रुपए
पांच साल के लिए और वह इसकी ईएमआई चुका नहीं पाता है तो बैंक में आवेदन कर
लोन की अवधि को 10 से 15 साल तक बढ़ाकर वह ईएमआई का बोझ कम कर सकता है।
लोन की अवधि लंबी होने पर ईएमआई कम आएगी, जिसे आप आसानी से इसे दे सकते
हैं।
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साभार: अमर उजाला समाचार
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