Monday, March 28, 2016

उत्तराखंड में सियासी उथलपुथल के चलते राष्ट्रपति शासन लागू

राजनीतिक घमासान के बीच उत्तराखंड में रविवार को राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की अनुशंसा के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस पर मुहर लगा दी। मंत्रिमंडल के फैसले को सही ठहराते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि संवैधानिक संकट से बचने के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करने का फैसला
लिया गया। जेटली ने कहा कि विधान सभा में वित्त विधेयक के पास नहीं होने के बाद हरीश रावत को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए था।यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश के बाद उत्तराखंड दूसरा कांग्रेस शासित राज्य है, जहां अंदरूनी बगावत से उपजे संवैधानिक संकट के कारण राष्ट्रपति शासन लगा है। केंद्र सरकार के इस निर्णय से तिलमिलाई कांग्रेस ने कहा है कि वह राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को अदालत में चुनौती देगी। अरुण जेटली ने कहा कि उत्तराखंड में तीन स्तरों पर संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। इसकी शुरूआत 18 मार्च को वित्त विधेयक के विधान सभा में गिर जाने से हुई। 68 विधायकों की मौजूदगी के दौरान विधान सभा में 35 विधायकों ने पहले ही वित्त विधेयक पर मतदान की मांग कर दी थी। बाद में सदन में इसकी मांग की गई थी। लेकिन मतदान के बजाय विधान सभा अध्यक्ष ने विधेयक को पास करा दिया। बाद में 35 विधायकों में दोबारा लिखित में विपक्ष में मतदान करने के बारे में विधान सभा अध्यक्ष को जानकारी दी। राज्यपाल केके पॉल ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि वित्त विधेयक के पास होने पर स्थिति साफ नहीं है। जेटली के अनुसार वित्त विधेयक के गिरने के बाद रावत सरकार का बने रहना असंवैधानिक था।ल्ल विधान सभा अध्यक्ष ने लिखित में माना कि सदन में मत विभाजन की मांग हुई थी। लेकिन उन्होंने विनियोग विधेयक को पारित मान लिया।
  • 68 साल के लोकतांत्रिक भारत में ऐसा पहली बार हुआ, जब खारिज विनियोग विधेयक को पारित मान लिया गया
  • रावत सरकार को बहुमत साबित करने को विस अध्यक्ष ने दिया ज्यादा वक्त, जबकि राज्यपाल ने दो-तीन दिन में ही बहुमत साबित करने को कहा था।
  • मुख्यमंत्री लंबा समय पाकर लालच देकर और खरीद-फरोख्त कर बहुमत साबित करने की कोशिश कर रहे थे।
  • यह पहला मौका है जब कोई मुख्यमंत्री विधायकों की खरीद-फरोख्त करता स्टिंग ऑपरेशन में कैद हुआ। 
उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगने के बीच राज्यपाल केके पॉल की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। भाजपा के वरिष्ठ नेता व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि पूरे प्रकरण में राज्यपाल की भूमिका संदिग्ध रही है। उनके अनुसार वित्त विधेयक गिरने के बाद राज्यपाल को तत्काल राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करनी चाहिए थी या फिर दो-तीन के भीतर विधान सभा में बहुमत साबित करने के लिए कहना चाहिए था। लेकिन मुख्यमंत्री हरीश रावत के अनुरोध को स्वीकार करते हुए उन्होंने 28 मार्च तक का समय दे दिया। इससे विधायकों की खरीद-फरोख्त का अवसर मिल गया, जो मुख्यमंत्री के स्टिंग से साफ हो गया है।
यही था एकमात्र रास्ता: जेटली के अनुसार वित्त विधेयक के गिरने के बाद उत्तराखंड वित्तीय संकट में घिर गया था। वित्त विधेयक पास हुए बिना कोई भी सरकार सरकारी खजाने से पैसे नहीं निकाल सकती है। इस संकट से बचने का एक ही रास्ता था कि विधान सभा को निलंबित रखकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। जेटली ने हरीश रावत के स्टिंग का जिक्र करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री खुद सरकार बचाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त करने में जुटे थे, जो लोकतंत्र के आधारभूत मूल्यों के खिलाफ हैं। जेटली ने कहा कि कांग्रेस बहुमत साबित करने के लिए दल-बदल विरोधी कानून की धज्जियां उड़ाने में लगी थी।
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साभारजागरण समाचार 
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