Friday, March 18, 2016

लाइफ मैनेजमेंट: हम अपने बच्चों के प्रति सबसे ज्यादा जवाबदार

एन रघुरामन (मैनेजमेंट फंडा)
मैं 16 मार्च 2016 को मध्यप्रदेश के गृह मंत्री बाबूलाल गौर के साथ भोपाल में एक पेंटिंग प्रदर्शनी में मौजूद था। प्रदर्शनी के क्यूरेटर उन चित्रों के पीछे की उम्मीद, सपनों, आजादी और पश्चाताप की कहानी के बारे में हमें बताने लगे। हर पेंटिंग की अपनी कहानी थी, लेकिन उनमें से एक कहानी कुछ अलग ही थी। यह त्रासदी हमारे
लिए एक सबक है। 23 अक्टूबर 2003 को देर रात एक बच्चे को अपने एक सवाल का जवाब परिवार के किसी सदस्य से नहीं मिल रहा था। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। कई बार पूछने के बाद भी नहीं। तब चिल्लाते हुए उसने पूछा था, 'हम यहां क्यों आए हैं।' बच्चा किसी भी तरह बड़ों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता था और जवाब चाहता था। 

उस चीख ने पुलिस थाने में मौजूद सभी पुलिसकर्मियों को चौका दिया। एक पुलिस वाला दौड़ते हुए आया और उसके पिता पर लाठी से वार करते हुए बोला, 'पूरा परिवार शैतान है, क्या एक बच्चे को भी काबू में नहीं रख सकते?' और उसने बच्चे को ऐसी नज़रों से देखा जिनका सामना उसने अपने जीवन में पहले कभी नहीं किया था। 30 महीनों तक मतलब पूरे ढाई साल तक बच्चा वही सवाल पूछता रहा, लेकिन धीमी आवाज में। बच्चे जवाब मिलने तक पूछते रहते हैं। यही उस बच्चे ने किया। जब तक कि उसे जवाब नहीं मिल गया पूछना जारी रहा। जब बच्चा पांच साल का हो गया तो आखिर उसे परिवार के साथ घर जाने को मिला, लेकिन पिता के बिना, जिसे मध्यप्रदेश की एक कोर्ट ने आजीवन करावास की सजा सुनाई थी। यह कहानी है विष्णु धोबी की। 
भोपाल के नजदीक चंदेरी गांव का रहने वाला उस बच्चे का पिता। उसमें एक मेमने को मारने की ताकत भी नहीं थी। संभवत: व्यवहार के मामले में वह अपने गांव का सबसे अच्छा किसान था। वह भी 22 साल की उम्र में, लेकिन अक्टूबर में उस बुरे दिन पड़ोस के गांव के 14 लोगों के परिवार ने जमीन के झगड़े में उसके पूरे परिवार पर दराती से हमला किया। तब परिवार जमीन के अपने उस छोटे टुकड़े पर काम कर रहा था। पूरा परिवार हताशा, गुस्से और दुख से भर गया। उसके हाथ में खून से सनी लाठी थी। उसे मारने आए एक ही परिवार के पांच लोग खून में सने पड़े थे, मृत। विष्णु के पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल केस चला। इस दौरान वह बच्चा भी अपनी मां के साथ जेल में रहा। जब तक कि कोर्ट ने परिवार के अन्य सदस्यों को सबूतों के अभाव में रिहा नहीं कर दिया। सिर्फ विष्णु को छोड़कर, जिसे जीवन भर के लिए सलाखों के पीछे डाल दिया गया। तभी से आज तब विष्णु धोबी एक सवाल का जवाब तलाश रहा है कि मेरे बेटे को तीस महीने जेल में क्यों रहना पड़ा, जबकि वह तो उस झगड़े के दृश्य को देखकर रो रहा था। यहां तक कि वह तो किसी को मारने के लिए एक कंकड़ तक नहीं उठा सकता। 
13 साल बीत जाने के बाद 35 साल की उम्र में वह कुछ जवाब पाने में सफल रहा है, हालांकि जरूरी नहीं कि यह सही जवाब हो। आईपीसी के सेक्शन 302 के तहत गिरफ्तार यह अपराधी जान गया है कि उसके आक्रोश और गुस्से पर नियंत्रण कर पाने का परिणाम पूरे परिवार को भुगतना पड़ा। कभी-कभी उसकी आंखें शर्म से झुक जाती हैं, जब वह उस बच्चे को देखता है, जो अब 16 साल का हो गया है। इसकी वजह यह है कि पालकों की सबसे ज्यादा जवाबदेही जवाबदारी बच्चों के प्रति होती है। मैंने सुना है खूबसूरती देखने वाले की आंखों में होती है, लेकिन यह नहीं जानता था कि यह अपराधी की आंखों से भी देखी जा सकती है, क्योंकि वह कलाकार जिसने इस किसान से हत्यारा बनने की इस पूरी कहानी को कैनवस पर रंगों में उतारा वह कोई और नहीं खुद विष्णु धोबी है। उसने अब अपने गुस्से को काबू कर लिया है और पेंसिल और पेंट ब्रश उसके हथियार हैं। 
फंडा यह है कि माता-पिता बनना अलग बात है, लेकिन जवाबदार पेरेंट बनना सबसे जरूरी है। आप अपने बच्चों के प्रति जवाबदार हैं, इस स्वार्थी समाज के प्रति नहीं। 

Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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