Monday, November 14, 2016

चिंताजनक: कार्टून फिल्मों के वजन तले पिस गया 'बाल साहित्य', बचपन खतरे में

मोनू की मम्मी इन दिनों इसलिए परेशान रहती हैं क्योंकि उनका आठ वर्षीय लाल पढ़ाई के पश्चात हर वक्त या तो कार्टून या फिर वास्तविकता से दूर सुपरमैन के चरित्र पर आधारित धारावाहिक प्रसारित करने वाले चैनलों से चिपका रहता है। उन्हें इस बात की चिंता खाये जा रही है कि कहीं उनका लाडला पारिवारिक एवं सामाजिक संवेदनाओं से दूर न रह जाए। इस तरह की चिंताएं अकेली मोनू की मां की ही नहीं बल्कि लाखों माता-पिता अथवा अभिभावकों की है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। चिंतक-विचारक इसे बदलते सामाजिक परिवेश व बाजारवाद के मेले में लुप्त होते बाल साहित्य का दुष्परिणाम मानते हैं। वे कहते हैं कि परिवार-समाज-देश की संस्कृति से दूर होते बालमन को बाल साहित्य की खुराक की दरकार है। अब यहां यक्ष-प्रश्न तो यह कि लुगदी की भेड़चाल में गुम बाल साहित्य आखिर लाएं कहां से? चंपक, चंदा मामा, लोटपोट व पराग जैसी बाल पत्रिकाएं बुक स्टॉल से गायब हैं तो बाल साहित्य लिखने वाले साहित्यकारों की लेखनी मंद पड़ गई है। 

हिंदी साहित्य के मूर्धन्य प्रो. हरभगवान चावला भी मानते हैं कि बाल साहित्य की जगह बाल चैनलों ने ले ली है और इन चैनलों ने बच्चों से पढ़ने की आदत छीन ली है। साथ ही, यह भी जोड़ते हैं कि बच्चों की मानसिकता से जुड़कर लिखा जाए, ऐसा कम हो रहा है। कमोबेश यही मानना है हिंदी के प्रखर नवगीतकार डॉ. राधेश्याम शुक्ल का। वह कहते हैं कि बाल साहित्य लिखने के नाम पर कई सड़क छाप झोला उठाए घूम रहे हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी से जुड़े रहे श्याम सखा श्याम व डॉ. चंद्र त्रिखा सरीखे साहित्यकार भी इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ते कि बहुत कम हैं बाल साहित्यकार। सच्चाई का एक पहलू यह भी है कि उर्मि कृष्ण, श्रीनिवास वत्स, घमंडीलाल व रामनिवास मानव जैसे कुछ विद्वान बाल साहित्य पर अपनी लेखनी चलाते रहे हैं। इसके बावजूद बाल साहित्य उपेक्षित है। कमोबेश यही हाल है बाल पत्रिका का। डॉ. चंद्र त्रिखा बड़े ही दुखी मन से कहते हैं कि यहां से एक भी बाल पत्रिका नहीं प्रकाशित होना तकलीफदेह है। इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।

पर्सनेलिटी डिसऑर्डर का खतरा: मनोविज्ञानी डॉ. ताज पनिकर कहती हैं कि व्यक्तित्व निर्माण काफी मददगार होती हैं बाल साहित्य की किताबें अथवा पत्रिकाएं। अन्यथा पर्सनेलिटी डिसऑर्डर का खतरा बढ़ जाता है। काटरून चैनल वायलेंट अर्थात हिंसक प्रवृत्ति को जन्म दे सकता है। यही वजह है कि बच्चे संवेदनहीन होते जा रहे और महज छह साल की बच्ची से दुष्कर्म जैसी दानवी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। साहित्य की खुराक न मिली तो बच्चों की खेप खत्म हो जाएगी। 

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साभारजागरण समाचार 
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