डॉ. इंद्रजीत सिंह (जीवी पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर ऐंड टेक्नोलॉजी उत्तराखंड के अंतर्गत संचालित कॉलेज ऑफ फिशरीज के डीन)
अब वह दौर नहीं रहा, जब मछली पालन सिर्फ मछुआरे ही किया करते थे। आज तो यह एक प्रतिष्ठित लघु उद्योग का रूप ले चुका है। मछली पालन परंपरागत खेती करने वाले किसानों के लिए भी
आर्थिक लाभ कमाने का एक बड़ा जरिया बन गया है। राज्य सरकारें भी अपने-अपने राज्यों में इस नीली क्रांति को काफी प्रोत्साहन दे रही हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षो से किसानों का आकर्षण मछली पालन के प्रति तेजी से बढ़ा है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। किसानों में यह रुचि इसलिए भी अधिक देखी जा रही है, क्योंकि एक हेक्टेयर खेत में गन्ना, धान, गेहूं और सब्जी उगाने पर जहां किसी किसान को बमुश्किल साल में एक लाख रुपये तक का ही लाभ मिल पाता है, वहीं इतने ही एरिया में मछली पालन करके वे ढाई से तीन गुना तक कमाई कर सकते हैं।
कम एरिया में अधिक मुनाफा: केंद्र सरकार ने भी किसानों की आमदनी को दोगुना करने का जो तानाबाना बुना है, वह भी मछली पालन के इर्दगिर्द ही है। मछली पालन करने के कई फायदे भी हैं, जैसे-यदि आपने कृत्रिम जलाशय बनाकर उसमें बरसात का पानी इकट्टा कर लिया, तो एक तो उसमें आप मछली पाल सकते हैं। इससे आपकी आमदनी दोगुनी हो जाएगी। फिर उसी पानी को आपने सिंचाई में इस्तेमाल कर लिया। इससे खेतों में करीब 25 फीसदी खाद की पूर्ति भी हो गई। ऊपर से भूमिगत जल स्तर भी ठीक हो गया, सो अलग। यूपी, बिहार समेत विभिन्न राज्यों से जो भी किसान हमारे यहां ट्रेनिंग के लिए आते हैं, उनका भी यही अनुभव है कि कम एरिया में मछली पालन करके फल-सब्जियों से कहीं अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। मेरे ही ऐसे तमाम शिष्य हैं, जो आज मछली पालन करके और इन्हें एक्सपोर्ट करके बहुत आगे निकल चुके हैं।
जानकारी लेकर बढ़ें आगे: यह ऐसा काम है, जिसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसके लिए न ही अधिक पढ़ाई की आवश्यकता है और न ही कोई खास स्किल चाहिए। हां, बस इस फील्ड की थोड़ी जानकारी होनी जरूरी है। अगर मछलियों को पालने की जानकारी नहीं होगी और अपनी 20-30 हजार की पूंजी लगा दी, तो जानकारी न होने या कम जानकारी होने की स्थिति में सब डूब सकता है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी लोग प्रशिक्षण लेकर ही यह काम करते हैं। बहुत से लोग खुद की पहल से जानकारी जुटाकर, गहन शोध करके यह काम कर रहे हैं। पंतनगर की कॉलेज ऑफ फिशरीज लोगों को इसके लिए ट्रेनिंग उपलब्ध करा रही है। लेकिन इसके लिए किसानों से शुल्क लिया जाता है। यह 10 दिन की ट्रेनिंग होती है। इसी शुल्क में किसानों को खाने और रहने की भी सुविधा दी जाती है। इस दौरान किसानों को मछली पालन के लिए तमाम चीजों की ट्रेनिंग दी जाती है, जैसे-मछली पालन कैसे करना है, मछलियों का बीज पालन कैसे करना है, सजावटी मछलियों का बिजनेस कैसे करें इत्यादि। ट्रेनिंग में हम यह भी बताते हैं कि एक्वेरियम में मछलियों के पानी की फिल्टरिंग कैसे करनी है, मछलियों के सांस लेने की व्यवस्था कैसे करनी है। कैसे आप मछलियों का प्रोडक्ट (कटलेट, अचार वगैरह) तैयार कर सकते हैं। दरअसल, इस तरह की ट्रेनिंग लेने का एक फायदा यह रहता है कि किसान संस्थान के सभी वैज्ञानिकों से परिचित हो जाते हैं तथा उनका नंबर लेकर रख लेते हैं और जब भी उन्हें कोई दिक्कत आती है, तो वैज्ञानिकों से सीधे फोन पर बात करके उसका समाधान पूछ लेते हैं। वैसे, जो लोग लोन लेकर यह काम कर रहे हैं, उन्हें लुघ उद्योग विभाग भी मछली पालन की जरूरी जानकारी उपलब्ध कराता है।
कितनी चाहिए पूंजी: मछली पालन करने को तो आप 20 हजार रुपये में भी कर सकते हैं। वैसे यह काम 20 हजार से लेकर 1 लाख तक की पूंजी में किया जा सकता है। इसके अलावा, मछली पालन के लिए कम से कम एक एकड़ का तालाब होना चाहिए। दरअसल, पूंजी आपकी उत्पादन क्षमता पर निर्भर करती है, क्योंकि एक हजार किलो का मैनेजमेंट अलग होता है, 5 हजार किलो और 10 हजार किलो का अलग। मान लीजिए आपने 20 हजार की पूंजी लगाई, तो रिटर्न में आपको 60 हजार तक मिलेगा। अगर एक लाख लगाएंगे, तो 3 लाख तक कमाएंगे। इसी खर्चे में मछलियों के खाने की भी व्यवस्था करनी होती है, जैसे-पंगस मछली जो कि एक विदेशी प्रजाति है, इसे सिर्फ कंपनी द्वारा तैयार खाना ही दिया जाता है। आजकल इस मछली के उत्पादन पर काफी जोर है। क्योंकि यह छह महीने में ही तैयार हो जाती है और सिर्फ गर्मियों में ही बिकती है। सर्दी आते ही ये मछलियां मरने लगती हैं, इसलिए लोग मार्च से लेकर जुलाई-अगस्त तक इसका उत्पादन करके बेच लेते हैं।
इसी तरह कतला, रोहू, मिरगल, कामन कार्प, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प, कालवासु, कतरोहू, बाटा और महाशीर जैसी कुछ प्रचलित परंपरागत प्रजातियां भी हैं, जो करीब एक साल में तैयार होती हैं। लेकिन ये मछलियां पंगस से महंगी बिकती हैं। अभी भारत में ही नहीं, तकरीबन पूरे एशिया में इन्हीं प्रजातियों का उत्पादन हो रहा है। इन मछलियों को खाने में खली, भूसी, पालिस और बना बनाया भोजन दिया जाता है।
मछली के बीज: इस व्यवसाय में किसानों के सामने बीज की कोई दिक्कत नहीं है। मछली बीज आजकल हर जगह आसानी से मिल जाता है। इसे सरकारी हैचरीज यानी मत्स्य केंद्र से भी ले सकते हैं। शोध संस्थानों की हैचरीज में भी यह बीज मिलता है। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में ढेर सारी प्राइवेट हैचरीज भी हैं, जहां पर मछलियों के बीज मिलते हैं। यूपी के रामपुर और उत्तराखंड के काशीपुर में ऐसी ढेर सारी हैचरीज हैं।
आमदनी: मछली पालन करके कोई व्यक्ति साल में कितनी कमाई कर सकता है, यह उसकी उत्पादन क्षमता पर निर्भर करता है। वैसे अगर एक औसत कमाई की बात करूं , तो एक एकड़ एरिया के तालाब से सारे खर्चे निकाल कर कोई भी व्यक्ति कम से कम एक लाख रुपये तक कमा सकता है। यदि इसी को और ढंग से किया जाए, तो साल में 2 से 3 लाख रुपये तक भी कमाया जा सकता है।
लोन की सुविधा: मछली पालन को चूंकि कृषि पेशे के तहत शामिल किया जाता है, इसलिए इस व्यवसाय को करने के लिए किसी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती है। ऊपर से सरकार इस व्यवसाय के लिए रियायती दरों पर लोन भी मुहैया कराती है। इस तरह के लोन पर लोगों को कैटेगरी वाइज 25 से 50 प्रतिशत तक की छूट मिलती है। राज्य सरकार के लघु उद्योग कार्यालयों में इसके लिए संपर्क कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के अंतर्गत भी सरकार स्वरोजगार के लिए 10 लाख रुपए तक ऋ ण मुहैया करवाती है।
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साभार: जागरण समाचार
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