एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
स्टोरी 1: इस बुधवार मैं रायपुर से 120 किलोमीटर दूर स्थित कबीरधाम जा रहा था, जहां छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का निवास है और उनके पुत्र अभिषेक सिंह वहां के सांसद हैं। रायपुर के मुख्य शहर से
20 किलोमीटर दूर खमतराई के पास मेटल पार्क जंक्शन पर सिग्नल लाल होने से मेरी कार रुकी। मेरी विपरीत दिशा से रही बाइक भी रुकी, लेकिन उसके पीछे रही मेटाडोर ने बाएं से बाइक को छोटा-सा कट मारा और तेजी से आगे बढ़ी। सामने से आने वाला ट्रैफिक शुरू हो चुका था। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। बाइक के तीनों सवार हवा में फिका गए और तेजी से बढ़ती मेटाडोर के सामने गिरने वाली एक महिला थी, जिसका पैर मेटाडोर के पहिये के नीचे गया। दोनों पालकों के बीच बैठा बच्चा सौभाग्य से बच गया। हेलमेट ने बाइक सवार को बचा लिया, जो सिर के बल गिरा था। ट्रैफिक पूरी तरह रुक गया। जल्दी ही लोग इकट्ठा हो गए। मिनी ट्रक से एक आदमी कूदा और अन्य बाइकर की मदद ली और उस वाहन का पीछा करने लगा, जिसने तीनों को टक्कर मारी थी। युवा एग्ज़ीक्यूटिव आदित्य खंडेलवाल ने एंबुलेंस बुला ली, जिला खेल अधिकारी तनवीर अकिल ने स्थिति को अपने हाथों में ले लिया। स्थानीय पंडितजी ने उन्हें भीड़ को हटाने में मदद की। महिला को अत्यधिक तकलीफ और अपने बच्चे पति की चिंता में देखकर तनवीर ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे दोनों सुरक्षित है और रोड डिवाइडर के बीच उन्हें लिटाकर पीने के लिए पानी दिया। पंडितजी और अन्य राहगीरों ने ट्रैफिक सुगम बनाने में मदद की।
उसी समय मैंने देखा कि तनवीर ने अपने जर्जर-से पर्स में हाथ डाला और कुछ गुलाबी-हरे नोट निकालकर नीचे गिरे पुरुष को देते हुए कहा, 'आपको शायद दवाई खरीदने के लिए जरूरत पड़े।' यह करते हुए उनकी आंखें नम हो आईं, तभी एंबुलेंस गई और तीनों भीतर चले गए। दो मिनट बाद ही पुलिस गई। तनवीर और पंडितजी ने बाइक उनके हवाले की। जब मैंने तनवीर से पूछा कि क्या उन्हें पैसा वापस मिलेगा तो उन्होंने कहा, 'क्यों नहीं, अल्लाह ने चाहा तो जरूर मिलेगा।' देर रात मुझे पता चला कि उस परिवार के सदस्य स्थानीय पशु चिकित्सालय के सहायक शल्य चिकित्सक डॉ. धर्मेन्द्र खुरे, उनकी पत्नी विशाखा और चार वर्षीय बेटी विभूति सुरक्षित थे। धर्मेन्द्र मानते हैं कि वे इसलिए बच गए, क्योंकि वे उन जानवरों को बचाने का प्रयास करते हैं, जो तकलीफ बता नहीं सकते!
स्टोरी 2: बाद में कबीरधाम में मैं 18 वर्षीय ललित यादु से मिला, जो हिंदी भाषी आबादी के हिसाब से अच्छी अंग्रेजी लिख-बोल लेते हैं। उनके पिता पान की दुकान चलाते हैं और उनके परिवार की आय 150 रुपए प्रतिदिन है। ललित बीए दूसरे वर्ष के छात्र हैं, उनका भाई बीएड कर रहा है और बहन 11वीं में पढ़ती है। वे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में डैटा मॉनिटरिंग असिस्टेंट के रूप में अंशकालिक काम भी करते हैं और हर माह 5 हजार रुपए कमा लेते हैं। वे यूपीएससी परीक्षा की भी तैयारी कर रहे हैं। शाम को वे गरीब बच्चों को सारे विषय नि:शुल्क पढ़ाते हैं। चूंकि वे सरकारी स्कूल से बढ़े हैं, जहां कई विषयों के लिए अध्यापक नहीं हैं तो उन्हें लगता है कि अपने इलाके के लिए बच्चों की यह कठिनाई दूर करना उनका काम है। वे रोज अपनी बहन और कुछ खास मित्रों के साथ इंग्लिश बोलते हैं ताकि इस विदेशी भाषा में महारत हासिल हो जाए। उनमें बहुत आत्मविश्वास है और मानते हैं कि वे जीवन में इसलिए आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि वे अन्य छात्रों को आगे बढ़ने में मदद करते हैं।
फंडा यह है कि ईश्वर से डरने वाले दिलचस्प लोग हमारे आसपास मौजूद हैं। हमें उन्हें पहचान कर उनसे जिंदगी के गुर सीखने चाहिए।
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साभार: भास्कर समाचार
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