Thursday, September 1, 2016

शैक्षणिक कॅरिअर में भी 'लीप फ्रॉग' संभव‌: बिना बारहवीं के अमेरिका की MIT में दाखिला लेने वाली मालविका की सक्सेस स्टोरी

एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
चार साल पहले तक वह भी शहर के किसी अन्य प्रतिभाशाली छात्रा की ही तरह थी। अच्छे अंक हासिल कर रही थी और पैरेंट्स को उस पर गर्व था। वह मुंबई के दादर पारसी यूथ असेंबली स्कूल में कक्षा 7वीं की छात्रा थी।
किसी भी मध्यवर्गीय परिवार में अकादमिक विलक्षणता काफी अंतर पैदा कर देती है। लेकिन एक एनजीओ में कैंसर रोगियों के लिए काम करने वाली मां सुप्रिया ने देखा कि उनकी बड़ी बेटी बहुत खुश नहीं है। काम के दौरान उन्होंने कक्षा 8 और 9 में पढ़ने वाले कई बच्चों को भी कैंसर से पीड़ित देखा था। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। इसने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और एक दिन उन्होंने निर्णय किया कि मेरी बेटी को खुश रहना चाहिए और इसके लिए वे कुछ भी करेंगी। नाटकीय रूप से उन्होंने बेटी को स्कूल से निकाला। उनके मध्यवर्गीय समुदाय के लोगों और रिश्तेदारों को काफी आश्चर्य हुआ। सुप्रिया ने इंजीनियर और सफल व्यवसायी पति को विश्वास में लिया और बताया कि खुशी परंपरागत ज्ञान से ज्यादा जरूरी है। यह कोई आसान निर्णय नहीं था। उनके आसपास के लोग और भारत के अधिकतर लोग अभी 'होम स्कूल्ड' से परिचित नहीं है। वे यही समझते हैं कि यह स्कूल जाना है। पति और बेटी को समझाने में भी समय लगा, क्योंकि उन्हें भी इस मामले में दुनिया का सामना करना था, लेकिन फिर बेटी ने मान लिया कि मां का निर्णय ही अंतिम है। 
लोगों ने चेतावनी दी कि 10वीं-12वीं पास होने के प्रमाण-पत्र के बिना यह जोखिमभरा फैसला है, लेकिन सुप्रिया तय कर चुकी थीं। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और घर में ही क्लासरूम बनाया। वे इस बात के प्रति आश्वस्त थीं कि वे बेटी को ज्ञान प्रदान करने में सक्षम हैं। शुरुआती समस्याओं का समाधान हो गया तो उन्होंने देखा कि बेटी अचानक पहले से ज्यादा खुश रहने लगी है। वह ज्यादा सीख रही थी- जागने के समय से लेकर सोने तक। 13 साल की उस लड़की के लिए ज्ञान हासिल करना ही जुनून बन गया। सिर्फ एक या दो साल नहीं यह सिलसिला चार साल चला और इन सभी वर्षों में वह उन शीर्ष चार छात्रों में शामिल रही, जिन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व प्रोग्रामिंग ओलिंपियाड में किया तथा मेडल और पुरस्कार जीते। जब वह 16-17 साल की हो गई तो सुप्रिया ने आईआईटी सहित कई बड़े कॉलेजों में उसका एडमिशन कराने कोशिश की, लेकिन एडमिशन देने से इंकार कर दिया गया, क्योंकि वह 12वीं पास करने के सख्त नियम को पूरा नहीं करती थी। उसे सिर्फ चेन्नई मेथमेटिकल इंस्टिट्यूट में ही एमएससी लेवल के कोर्स में प्रवेश मिला, क्योंकि पाया गया कि उसका ज्ञान बीएससी के स्तर से ज्यादा है। सुप्रिया और उनकी बेटी इससे खुश नहीं थे। वे कोशिश करते रहे और आखिर इस महीने सु्प्रिया की बेटी मालविका राज जोशी को प्रतिष्ठित मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी (एमआईटी) में प्रवेश मिल गया। वजह थी कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की उसकी प्रतिभा। 
एमआईटी में ऐसे विद्यार्थियों को भी प्रवेश देने का प्रावधान है, जिन्होंने कई ओलिंपियाड में मेडल जीते हों और मालविका के ओलिंपियाड पदकों की ही वजह से यह सुनिश्चित हुआ कि वह अब कंप्यूटर साइंस में वहां रिसर्च करेगी। मां-बेटी के भरोसे ने आत्मविश्वास पैदा किया था और उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि ज्ञान मार्कशीट से ज्यादा महत्वपूर्ण है। मालविका अब पसंदीदा विषय कंप्यूटर साइंस में रिसर्च करेंगी। बिज़नेस में 'लीप फ्रॉग' रणनीति प्रचलित है, जिसमें बिज़नेसमैन थोड़ा पीछे जाता है और फिर सही समय का इंतजार करते हुए लंबी छलांग लगाता है और प्रतिस्पर्द्धियों को पीछे छोड़ देता है, लेकिन इसका शिक्षा और किसी बच्चे का कॅरिअर बनाने में इस्तेमाल और वह भी भारत में दिलचस्प है। 
फंडा यह है कि अगर सही दृष्टि कोण हो, कदम उठाने की क्षमता हो, तो कोई भी, किसी भी क्षेत्र में 'लीप फ्रॉग' कर सकता है। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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