हर साल 50 लाख से ज्यादा छात्र देश में ग्रेजुएट बनते हैं। करीब 35 हजार कॉलेज हैं और 80 फीसदी से ज्यादा छात्र नॉन-टेक्निकल जॉब की चाहत रखते हैं। छात्र अपने सपनों को पूरा करने की बड़ी उम्मीदें लिए कॉलेज में प्रवेश लेते हैं, लेकिन डिग्री पूरी होते-होते सारी आशाएं टूटने लगती हैं। उन्हें पता चल जाता है कि अब तक जिस
सपनों की नौकरी और बड़े पैकेज के लिए वे इतनी मेहनत कर रहे थे, वो तो कुछ गिने-चुने छात्रों को ही मिल पाती हैं। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं।
अंडर एंप्लॉयमेंट का कारण क्या है: क्या पढ़ाया जाता है - कॉलेजशिक्षा के दौरान छात्रों को थ्योरी के साथ पुरानी हो चुकी तकनीकों की जानकारी दी जाती है। फाइनेंस की पढ़ाई करने वाले अधिकांश छात्र अतिरिक्त ट्रेनिंग के बिना फाइनेंशियल मॉडल नहीं तैयार कर सकते, कंप्यूटर साइंस के छात्र अलग से कोचिंग ने लें तो कोडिंग नहीं कर पाते। गिने-चुने कॉलेज ही हैं जो छात्रों को किताब के बाहर की बातें बताते हैं, जबकि नियोक्ता कंपनियां ऐसे ग्रेजुएट्स की तलाश करती हैं जो स्पेशलाइज्ड फील्ड की डोमेन नॉलेज के साथ सॉफ्ट स्किल्स भी जानते हों।
कैसे पढ़ाया जाता है: रिसर्चके अनुसार पढ़ाई का तरीका छात्र-केंद्रित हो, जिसमें शिक्षक फीडबैक के अनुरूप जरूरी बदलाव करें, तो लर्निंग का स्तर सबसे अच्छा होता है। प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग से भविष्य की बेहतर तैयारी होती है। इसके बावजूद हमारे कॉलेज के क्लासरूम्स में लेक्चर पर जोर होता है। पढ़ाई का तरीका ऐसा होता है कि छात्र अपने दम पर कुछ कर नहीं सकता।
कॉलेज कॅरिकुलम में जॉब के लिए तैयारी को जगह नहीं दी गई है,जबकि नौकरी के लिए डोमेन नॉलेज, इंटरव्यू और सॉफ्ट स्किल्स भी जरूरी हैं।
- श्वेता रैना (हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से ग्रेजुएट और टेलीरंग की फाउंडर सीईओ)
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साभार: भास्कर समाचार
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