Saturday, July 9, 2016

लाइफ मैनेजमेंट: गलती पर सवाल ही करें, सुधार का कदम भी उठाएं

एन. रघुरामन (मैनेजमेंटगुरु)
सियाचीन ग्लेशियरमें फरवरी में हिमस्खलन के बाद आर्मी कैंप के लांस नायक हुनमनथप्पा कोप्पाड और मद्रास रेजिमेंट के नौ अन्य सैनिकों के बर्फ में दबने की दिल दहला देने वाली घटना को कौन भूल सकता है। हर भारतीय के लबों पर सैनिकों की जिंदगी के लिए सैकड़ों प्रार्थनाएं थीं। सभी लोग एक ही सवाल कर रहे थे कि
हमारे पास ऐसे बचाव अभियानों चलाने के लिए क्या सुविधाएं हैं? यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया कई अन्य मंचों पर 'जोर-शोर' से सवाल उठा या गया कि क्या बेहतर उपकरणों से बर्फ में दबी इन जिंदगियों को बचाया जा सकता था? इसी सवाल ने बेंगलुरु के सीएमआर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के चार छात्रों को मौजूदा डीप पेनिट्रेशन रडार के विकल्प के बारे में सोचने पर मजबूर किया। ये रडार धातु की चीजें खोजने में इस्तेमाल होते हैं। इसी के जरिये बचाव दल ने सैनिकों को तलाशा था। 
हमारी सेना दस बहादुर सैनिकों को खो बैठी, क्योंकि परंपरागत तरीके से खोज अभियान चलाने में करीब एक सप्ताह का लगा। सबसे ज्यादा समय लगा टनों बर्फ में दबे सैनिकों का पता लगाने में। आमतौर पर आर्मी रडार लगे हेलिकॉप्टर लेकर आती है, जो दुर्घटनास्थल पर 100 मीटर की ऊंचाई पर मंडराते रहते हैं। वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे ग्राउंड रडार अच्छे परिणाम नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि ये मेटल या थर्मल सेंसर्स पर निर्भर होते हैं। हिमस्खलन में दबने वाले के पास धातु की कोई चीज नहीं हो तो ये सेंसर उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पाते। चारों छात्र विकल्प के बारे में सोचने लगे। उन्होंने ऐसा डिवाइस बनाने की कोशिश की जो डिटेक्शन के लिए धातु या तापमान पर निर्भर हो। 
हिमस्खलन की स्थिति में लंबे समय तक बचे रहने और 30 फीट की गहराई तक दबे इंसान का पता लगाने वाले जोरदार उपकरण की तलाश में उन्होंने एक प्रोटोटाइप बनाया। यह बर्फ के नीचे दबे व्यक्ति को शरीर के डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टंट' के जरिये तलाश लेता है। डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टंट वह आंकड़ा होता है, जो किसी भी वस्तु की बिजली का आवेश धारण करने की क्षमता बताता है। आवेश यदि उस क्षमता से बाहर जाए तो करंट बहने लगता है। नया डिवाइस अल्ट्रासॉनिक सेंसर का इस्तेमाल करता है और बर्फ के नीचे दबे किसी भी जीव को उसकी तरंगों के जरिये डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टंट के आधार पर पहचान लेता है। डिवाइस पहले से दर्ज डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टंट के आंकड़े की मनुष्य के डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टंट से तुलना करता है। फ्रिक्वेंसी मॉड्यूलेटेड कंटीन्यूअस वेव रडार इसका मुख्य आधार है और यह डिवाइस कम गहराई में दबी चीजों का पता लगाने में भी सक्षम होने के साथ मौजूदा प्रणाली का स्थान भी ले सकता है। 
सागरिका टी सामन्ता, भवानी पुरोहित, संध्या एस. और साक्षी रंजन ने अकादमिक प्रोजेक्ट के तहत इस पर अपना काम फरवरी माह के आखिरी दिनों में शुरू किया था और अप्रैल में इसे पूरा कर लिया। जब उन्हें अहसास हुआ कि यह डिवाइस हमारी मुश्किल जगहों पर तैनात और सीमाओं की रक्षा के लिए जाने तक देने को तैयार भारतीय सेना के लिए मददगार हो सकता है, तो उन्होंने इस पर कई महीनों तक काम किया। असल डिवाइस बनाने के जरूरी इंतजाम और संसाधन इन छात्रों के लिए जुटा पाना मुश्किल है। प्रोजेक्ट में मुख्य काम कोडिंग का है। असिस्टेंट प्रोफेसर अभिषेक जवाली कहते हैं कि अब कॉलेज की ओर से प्रयास हो रहे हैं कि इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को बाहरी फंडिंग के जरिये आगे ले जाया जा सके अथवा डीआरडीओ इसरो जैसे बड़े सरकारी संस्थान की ओर से मदद मिल जाए। ये संस्थान भी अपनी वर्तमान प्रणाली में इस तरह का सुधार पसंद करेंगे। 

फंडा यह है कि यदिआप विशेषज्ञ हैं तो किसी गलत चीज पर सवाल उठाने के साथ आपको उसे ठीक करने के लिए कदम भी उठाने चाहिए। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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