Monday, February 13, 2017

गृहिणी को कॅरिअर ऊंचा उठाने से कोई चीज नहीं रोक सकती

एन. रघुरामन (मैनेजमेंटगुरु)
वे किसी भी ऐसे रूढ़िवादी परिवार की थीं, जो अपनी बेटियों की अच्छी पढ़ाई सुनिश्चित करते हैं और कोई योग्य वर मिलने पर उनकी शादी कर देते हैं। उसके बाद ये बेटियां पारिवारिक प्रक्रियाओं से गुजरती हैं और जिम्मेदार
पत्नी, बहू बनती हैं और फिर बच्चों को जन्म देकर मां बन जाती हैं। यह उस परीकथा की तरह है, जिसका सुखद अंत होता है। रिश्तेदारों में हर कोई खुशी महसूस करता है, क्योंकि परिवार की बेटी समाज की जिम्मेदार मां बन जाती है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। 
कुछ परिवार के समर्थन से कोई जॉब करने लगती हैं और अपने परिवार की रिटायर होने तक मदद करती है। उनमें से कुछ कॅरिअर से छुट्‌टी लेकर गृहिणी के रूप में वृद्धावस्था तक पहुंचती हैं। जो शिक्षा उन्होंने अपनी युवावस्था में ग्रहण की थी उसके हश्र पर कभी एक शब्द चर्चा नहीं होती। 
वर्ष 1998 में केमेस्ट्री में एमएससी करने वाली भोपाल की 22 वर्षीय ममता बनर्जी इसी प्रक्रिया से गुजरीं। उनकी शादी जल्दी हो गई। स्थानीय अनुदानप्राप्त कॉलेज में जॉब मिल गया और उन्होंने जितनी संभव थी उतनी जिम्मेदारियां ले लीं। उनका मूल काम तो पढ़ाना ही था लेकिन, प्रशासन, छात्रों को व्यावहारिक अनुभव के लिए उद्योगों में ले जाना, सेमिनार आयोजित करना और कई समितियों का हिस्सा होना उनके रूटीन हो गया। यह उनका अपना कम्फर्ट जोन था। इन जिम्मेदारियों में काम भी बहुत था तो थकान भी। इसके बावजूद उन्होंने ठहरने की बिल्कुल नहीं सोची और लगातार आगे ही बढ़ती रहीं। 
इन दोहरी भूमिकाओं में उन्हें जिस चीज ने सफल बनाया वह था, एक बार में वे जिस भी भूमिका में होती, शत-प्रतिशत उसी में मौजूद रहतीं। यानी किसी भी एक काम को पूरा मन लागकर करना और उसे अंजाम तक पहुंचाना। उसे बीच में छोड़ देना उन्होंने कभी नहीं सीखा था। कॉलेज में रहते वे कभी घर की चिंता करतीं और घर में रहते कभी कॉलेज के बारे में नहीं सोचतीं। पेशेवर तौर पर उन्होंने पीएचडी की और डॉ. ममता बन गईं, जबकि दो बेटियों को जन्म देकर घर में मां बन गईं। यह वैसी स्थिति होती है, जिसमें घर और बाहर बड़ी जिम्मेदारियों को केवल निभाना, बल्कि पूरा करना होता है। वे दृष्टिहीन छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री रिकॉर्ड करने के काम में शामिल हो गईं। तभी उन्हें अहसास हुआ कि उनमें मानवता की सेवा करने की योग्यता है, जो मौजूदा जॉब में कहीं दबकर रह गई है। चार साल पहले 35 वर्ष की उम्र में, जब उनकी बेटियां 5 और 9 वर्ष की थी और उन्हें मां की सर्वाधिक जरूरत थी तो उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें तो किसी और जगह होना चाहिए। उन्होंने समाज में सक्रिय रूप से योगदान देने का निर्णय लिया और सिविल सेवा में जाने का निर्णय लिया। 
उन्हें पता चला कि मध्यप्रदेश की मूल निवासी होने के कारण वे 45 वर्ष की उम्र तक प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा दे सकती थीं। उन्होंने एमपीपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी, जबकि उन्हें इससे पहले प्रतियोगी परीक्षा देेने का कोई अनुभव नहीं था, क्योंकि उन्होंने एेसी कोई परीक्षा कभी दी ही नहीं। उन्होंने प्रारंक्षिक परीक्षा तो पास कर ली लेकिन, मुख्य परीक्षा वे दूसरे प्रयास में ही पास कर सकीं। परीक्षा में कामयाब होने तक वे जॉब में लगी रहीं, क्योंकि आर्थिक आत्मनिर्भरता उनके लिए सबसे जरूरी थी। उनके सामने पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं। 
दो हफ्ते पहले ़़डॉ. ममता बनर्जी भोपाल से 50 किलोमीटर दूर सीहोर जिले के इच्छावर में महिला सशक्तीकरण अधिकारी बन गईं। घर और दफ्तर को अच्छी तरह चलाते हुए वे रोज भोपाल से इच्छावर आती जाती हैं। उनके नए काम में एक ही प्रखंड के 15 वार्ड में फैली 70 ग्राम पंचायतों की 138 आंगनवाड़ियों में फैली महिलाओं के लिए लाई जाने वाली विभिन्न सरकारी योजनाओं पर निगरानी रखने का दायित्व शामिल था। उन्होंने आबादीगत आंकड़ें जुटाकर उस क्षेत्र के लिए कार्रवाई योजना पर काम भी शुरू कर दिया है, जिसमें 2011 की जनगणना के मुताबिक 1.48 लाख की आबादी में बच्चियों सहित 71 हजार महिलाएं हैं। 
वे बहुत खुश हैं, क्योंकि उनका परिवार घर के दो बच्चों से बढ़कर कॉलेज में 2 हजार का हुआ और अब नए जॉब में हजारों तक पहुंच गया है। महिला सशक्तीकरण के तहत उनका मुख्य काम ही महिलाओं को यह समझाना है कि वे अपने जीवन के सपनों को वैवाहिक परिवारिक दबाव में दफन करें। उन सैंकड़ों सरकारी योजनाओं के माध्यम से उन्हें साकार करने का प्रयत्न करें, जिनके बारे में महिलाओं को पता नहीं है। 
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साभार: भास्कर समाचार 
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