मैनेजमेंट फंडा (एन. रघुरामन)
यह 1987 की अंधेरी रात थी। वह सिर्फ 12 साल का था और बहुत जल्दी सोने चला गया, जबकि तमिलनाडु के तंजावुर का वह सुदूरवर्ती गांव वैसे ही रात 9 बजे सो जाता था। उस आधी रात जो हुआ वैसा उसके साथ कभी नहीं हुआ। उसकी मां ने उसका कंबल हटाकर खुद ओढ़ लिया- शायद उन्हें वाकई बहुत ठंड लग रही थी, लेकिन पिता को खो चुका वह छोटा बालक अपने कंबल के लिए रोने लगा। मां ने अपने थके चेहरे से कुछ सेकंड उसे देखा और यदि कोई उस वक्त उनकी आंखों के भाव पढ़ता तो उसमें यह चिंता थी, 'इस बच्चे का क्या होगा।' मां ने चुपचाप उस पर कंबल ओढ़ा दिया और दोनों अगले ही क्षण गहरी नींद में चले गए। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं।
अगली सुबह वह उठा तो यही जानने के लिए कि उसकी मां नींद में चल बसी हैं। उसे अपनी मां का वह चेहरा याद आया, जो उसने पिछली रात देखा था। थका हुआ और संदेह से भरा। उसे मां का मुस्कराता चेहरा याद नहीं आया, क्योंकि पिता की मौत के बाद वह कभी मुस्कराई ही नहीं। हो सकता बच्चों की चिंता इसका कारण हो। बाद के वक्त में वह कभी खुद को माफ नहीं कर पाया। उसे लगता कि अपनी मां की मौत की वजह वह खुद है।
उसके बाद तो किसी बॉलीवुड मूवी की तरह उसकी जिंदगी तेज रफ्तार से चल पड़ी। बच्चा जाकर रेल की पटरी पर सो जाता है ताकि ट्रेन आकर उसे कुचल दे। एक पुलिस वाला उसे देखता है और किसी मामले में 'संदिग्ध' बताकर मामला दायर कर लेता है। पंद्रह दिन की यंत्रणा झेलने और अगले 15 दिन बाल सुधार गृह में गुजारने के बाद उसे कोई रिश्तेदार जमानत पर रिहा कराता है। 'संदिग्ध चोर' के अतिरिक्त तमगे के साथ उसे बहुत शर्म महसूस होती है। उसकी ख्वाहिश थी कि वह यदि अपने गांव लौटे तो किसी धनी और प्रसिद्ध व्यक्ति की तरह या मृत शरीर के रूप में। वह दौड़कर स्टेशन पहुंचता है और एक ट्रेन पर सवार हो जाता है। यह वही ट्रेन थी, जिसके आगे वह एक दिन मरने के लिए लेट गया था।
सिर्फ टी शर्ट और लुंगी पहने वह तब के मद्रास पहुंचा, जिसे अब चेन्नई कहा जाता है। वह सड़कों, फ्लाई ओवर और इमारतों के किसी कोने में सोता। आखिर में भयावह भूख से मजबूर होकर वह वेटर हो गया, जिससे रोज भोजन मिलता और महीने में 100 रुपए से कुछ अधिक आमदनी हो जाती। उसने ऑफिस बॉय, कार-बाइक मैकेनिक और दूसरे कई तरह के काम किए। कुछ पैसा इकट्ठा हुआ तो वह अपने लिए कपड़े खरीदने गया, लेकिन ले आया एक सस्ता-सा कैमरा, जिससे वह बड़ा प्रभावित हुआ था। फोटोग्राफी में उसे खुशी मिलती और वह अभिनय में किस्मत आजमाने की हरसत पालने वाले सहयोगियों के फोटो शूट करने लगा। वह शब्द सुनने की बजाय दृश्यों के लिए अंग्रेजी फिल्में देखता। इंग्लिश से तमिल अनुवाद की पुस्तकें पढ़कर उसने अंग्रेजी के कुछ शब्द सीख लिए।
यह वह वक्त था जब फिल्म उद्योग में और खासतौर पर तमिल हिंदी फिल्म उद्योग में बहुत सारे सिनेमैटोग्राफरों के लिए दरवाजे खुल रहे थे। सिनेमा के जुनून ने उसे अपने अभिनेता बनने की चाह वाले दोस्तों के साथ मौके की तलाश में लगा दिया। 1989 में कुछ विफलताओं के बाद उसका परिचय प्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफर वी. रंगा से हुआ। वे उस वक्त रजनीकांत की फिल्म माप्पिल्लई (दूल्हा) के लिए काम कर रहे थे। वह उनका सहायक बन गया और उनके साथ अगले कुछ बरसों में अपने कॅरिअर की मजबूत नींव रखी। इस दौरान उसने बहुत उतार-चढ़ाव देखें और बहुत कड़ी मेहनत भी की।
दो बच्चों के पिता रवि वर्मन से मिलिए, जो अपनी खास सिनेमैटोग्राफी शैली के लिए के लिए जाने जाते हैं और उन्हें 'गोलियों की रास लीला (राम लीला)' की सिनेमैटोग्राफी के लिए जी अवॉर्ड से नवाज़ा गया है। उन्होंने 'तमाशा' और 'बर्फी' जैसी कई फिल्मों में योगदान दिया है। अब हम 2016 में जाते हैं। वे संजय लीला भंसाली और अनुराग बसु जैसे डायरेक्टरों सहित कई अन्य भाषाओं के निर्देशकों के पसंदीदा सिनेमैटोग्राफर हैं। आज वे अपने गांव उसी तरह जाते हैं, जैसे वे जाना चाहते थे- धनी और प्रसिद्ध शख्सियत के रूप में।
फंडा यह है कि आपको अपनी जीत होने तक डटे रहना चाहिए, ज़िद नहीं छोड़नी चाहिए।
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साभार: भास्कर समाचार
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