Monday, July 11, 2016

लाइफ मैनेजमेंट: आस्था और प्रचुरता, समृद्धि का चोली-दामन सा साथ है

एन. रघुरामन (मैनेजमेंटगुरु)
नीति कथा : एकबार एक आदमी मरुस्थल में रास्ता भटक गया। मरुस्थल की यात्रा में रास्ता भटकने की गंुजाइश नहीं होती, क्योंकि पानी यात्रा के हिसाब से ही ले जाया जा सकता है। ऐसे में दो दिन से पानी मिलने से उसकी दशा खराब हो गई थी। वह खुद को घसीटकर जैसे-तैसे एक उजाड़ झोपड़ी में पहुंचा। अंदर पहुंचते ही
हैंडपम्प देखकर उसे बहुत आश्चर्य हुआ। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। उसने उसे चलाने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और थोड़ी ही देर में वह बहुत थक गया। फिर उसने एक कोने में बोतल देखी। पानी से भरी बोतल पर कार्क लगा था ताकि पानी भाप बनकर उड़ जाए। जीवनदायी, मीठा पानी वह पीने ही वाला था कि उसने बोतल पर लगी एक चिट्‌ठी देखी। उस पर हाथ से लिखा था, 'पानी का इस्तेमाल पम्प चालू करने में करें और अपना काम होने के बाद इस बोतल को फिर भरना भूलें।' चिट्‌ठी का संदेश पढ़कर वह ठिठक गया। 
उसके सामने दुविधा थी। वह निर्देश का पालन कर पम्प में पानी डाल सकता था या अनदेखी कर पानी पी सकता था। क्या करें? बोतल का निर्देश मानने का मतलब था, खुद की जिंदगी को जोखिम में डालना। यदि उसने पानी पम्प में डाला तो इसकी क्या गारंटी कि पम्प काम करेगा? यदि पम्प चला तो क्या होगा? पम्प में कोई रिसाव हुआ तो? यदि भूमिगत जल का स्रोत सूख गया हो तो? किंतु यदि बोतल पर दिए निर्देश सही हुए तो? क्या मुझे जोखिम लेना चाहिए? यदि यह झूठ हुआ तो वह पानी मिलने का अंतिम मौका गंवा देगा। 
हालांकि, जिंदगी दांव पर लगी होने के बावद भी उसका विवेक अभी मरा नहीं था, इसीलिए आस्था उसके विचारों पर हावी हो गई। कांपते हाथों से उसने पानी पम्प में डाला। फिर उसने आंखें बंद कीं, प्रार्थना की और पम्प चलाने में लग गया। उसने गड़गड़ाहट सुनी और कुछ ही देर में उफनता पानी बाहर निकला, उतना जितना वह शायद इस्तेमाल भी नहीं कर सकता था। उसने आगे की यात्रा के लिए अपने फ्लास्क में पानी भर लिया। उसकी जान में जान आई। जब मौत सामने दिखाई दे रही थी, तब जिंदगी के इस तोहफे ने उसे आभार की भावना से भर दिया। उसने बोतल में भी पानी भरकर उस पर कार्क लगा दिया। झोपड़ी से बाहर निकलने के पहले उसने अपनी हाथों से उस पर आगे लिखा- विश्वास कीजिए, इसमें लिखा है वैसा ही होता है! ये गहरी आस्था से निकले शब्द थे। 
सच्चीकहानी : राजस्थानके सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील के हमीरपुरा कस्बे के 45 गांवों के छात्र शहीद राजेंद्र सिंह सरकारी हायर सेकंडरी स्कूल में नहीं जा पाते थे, क्योंकि परिवहन का साधन नहीं था, जबकि स्कूल सिर्फ 3 किलोमीटर के दायरे में था। यह सरकारी स्कूल होने के बावजूद बहुत अच्छी तरह चलाया जा रहा था। गांव वालों ने पैसे इकट्‌ठे किए, बस खरीदी और पिछले हफ्ते इसे स्कूल को उपहार में दे दिया ताकि वह अपने छात्रों को लाने-भेजने की व्यवस्था कर सके। 
उन्होंने ड्राइवर की तनख्वाह और ईंधन का खर्च देने की सहमति भी दी। उन्होंने महसूस किया कि बस शुरू होने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बच्चे स्कूल जाएंगे, लेकिन बुजुर्गों ने महसूस किया कि सिर्फ जाने की व्यवस्था होना किसी छात्र को शिक्षा से वंचित रहने का कारण नहीं होना चाहिए। यह भी विवेक और आस्था का फैसला था। परिणाम की फिक्र किए बिना किया गया कर्म इसे ही कहते हैं। उनका भरोसा सही साबित हुआ। इस साल राजस्थान शिक्षा मंडल की दसवीं की परीक्षा में वहां के छात्रों के अच्छे प्रदर्शन से बुजुर्गों की पहल सार्थक हुई उन्हें प्रेरणा भी मिली। अब तो बस के जरिये 5 से 7 किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले तीन गांव केंतेवा, मनासिया और जसारासर भी स्कूल से जोड़ दिए गए हैं। अभी अधिकतर बच्चे पहली से पांचवीं के छात्र हैं। 
यह अच्छी बात है कि गांव वालों को पूरा भरोसा है कि उनकी इस पहल से अगली पीढ़ी उनसे ज्यादा तो पढ़ ही लेगी। जाहिर है गांव के लोग शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। पूर्व सैनिक हमीरपुरा के सरपंच रतन सिंह शेखावत ने 1.15 लाख रुपए का योगदान दिया। यह एक मिसाल ही कही जाएगी। शेष पैसा गांव वालों ने इकट्‌ठा किया। आज इस पहल के कारण गांव का हर बच्चा स्कूल जाता है। इस बुधवार को जब बस आई तो पालकों के चेहरे पर भी नई बस जैसी चमक दिखाई दी। यह नेक काम करने से आई चमक थी। 
फंडा यह है कि देनेकी क्रया में आस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें यह संदेश भी मिलता है कि अपनी अोर से पहले दिए बिना बदले में कुछ भी हमें बहुतायत या प्रचुरता में उपलब्ध नहीं होगा।

Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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