Friday, July 8, 2016

खुदाई के दौरान जींद के ईंटल गाँव में मिले वैदिक काल के अवशेष

जींद से 15 किलोमीटर दूरी ईंटल कलां गांव में प्राचीन तालाब की खुदाई के दौरान ऋग्वेद कालीन अवशेष मिले हैं। यहां करीब चार हजार पुरानी बड़ी बड़ी ईंटों से बनाई गई दीवार, जो महर्षि अत्री, उनकी पत्नी सती अनसूइया बेटे दत्तात्रेय का आश्रम कुंड की मानी जा रही हैं, जो सरस्वती नदी के किनारे स्थित थे। इतिहासकारों का दावा है
कि गांव का बाबा समाध वाला तालाब ऋग्वेदकालीन संस्कृति सभ्यता को समेटे हुए हैं। यह क्षेत्र सरस्वती नदी का प्रवाहित क्षेत्र रहा है, जहां महर्षि अत्री सती अनसूइया ने अपने आश्रमों में तप कर जन कल्याण के लिए वेदों का ज्ञान बांटा था। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। हजारों ऋषियों को अपने आश्रम में ज्ञान देने के बाद कुंड में यज्ञ कराकर महर्षि उन्हें अलग अलग क्षेत्रों में भेजकर वैदिक पद्धति को बढ़ावा देते थे। यह दावा गुरुवार को ईंटल कलां गांव में पहुंचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पूर्व डायरेक्टर डा. धर्मबीर शर्मा, इतिहास संकलन समिति के अध्यक्ष एवं हरियाणा इतिहास एवं संस्कृति अकेडमी के सदस्य प्रो. बीबी कौशिक डा. ओपी गुप्ता की टीम ने किया है। 
धार्मिक आयोजन को बनाया था कुंड, आते हैं श्रद्धालु: खुदाईके दौरान तालाब में मिली दीवार में एक से डेढ़ फुट तक की लंबाई वाली ईंटे मिली हैं। इन ईंटों पर तीन-तीन रेखाओं के निशान हैं, जिन्हें लोकतिहरे कहा जाता है, जो तीनों लोकों के प्रतीक माने जाते थे अर्थात विशिष्ट संस्कारों, आयोजनों यज्ञों आदि के संपादन के समय पूजा के लिए बनाए जाते थे। तालाब की बनावट और उक्त दीवारों की स्थितियों को देखकर लगता है कि यह तालाब धार्मिक आयोजनों के लिए बनाया था। ग्रामीणों के अनुसार यहां पर दक्षिण भारत से आज भी लोग तालाब में स्नान पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। दत्तात्रेय की जन्म कर्मस्थली रहे गांव में सर्वेक्षण करने पहुंची टीम में शामिल प्रो. बीबी कौशिक ने दावा किया कि यह स्थली महर्षि अत्री के बेटे दत्तात्रेय की जन्म कर्मस्थली रही है। सती अनसूइया ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बच्चा बनाकर यहां अपने लाड प्यार से पोषित किया था। उनके पुत्र दत्तात्रेय का जन्म पालन पोषण भी यहीं पर हुआ था। शास्त्रों में भी तीन कुंडों का उल्लेख है। अत्री कुंड, अनसूइया कुंड दत्तात्रेय कुंड। अब यहां बाबा समाध वाले का डेरा है, जो कुंडों की रक्षा करते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि जब जेसीबी आदि से प्राचीन दीवार को तोड़ने की कोशिश करते हैं तो मशीनें खराब हो जाती हैं। 
ईंटलकलां गांव के तालाब में करीब चार हजार साल पुरानी दीवार मिली है। यह ऋग्वेद काल के अवशेष हैं। भौतिक अवशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र सरस्वती नदी प्रवाहित क्षेत्र रहा है। हड़प्पा संस्कृति से पहले भी यहां वैदिक परंपरा रही है। ईंटल कलां तालाब के स्थान आसपास में महर्षि अत्री, सती अनसूइया उनके बेटे दत्तात्रेय के आश्रम भी रहे हैं। ऐसा हमारे द्वारा किए सर्वेक्षण में सामने आया है। सरकार को यह क्षेत्र पुरातत्व विभाग को सौंपना चाहिए। 
- डा.धर्मबीर शर्मा, पूर्व डायरेक्टर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग एवं शोधकर्ता सरस्वती हैरीटेज। 
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार 
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