हरमंदर सिंह भारी-भरकम बल्ले को काट-छांट कर छोटा कर रहे थे। पैसे नहीं थे कि पांच साल की बेटी के लिए नया बैट खरीदें। खुद क्लर्क की प्राइवेट नौकरी करते थे लेकिन बेटी के सपने को जीवित रखना चाहते थे। परेशानियां बहुत थीं लेकिन बेटी को तो बस खेलना था। उसका जुनून ही ऐसा था। यह कहानी है कि अभी ऑस्ट्रेलिया में वुमन बिग बैश लीग खेल रही 27 वर्षीय भारतीय क्रिकेटर हरमनप्रीत कौर की। वे भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्टार खिलाड़ी हैं और बिग बैश लीग में खेलने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर भी। वे भारतीय महिला टीम की कप्तान भी रही
हैं। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। मोगा छोटा शहर और उसमें भी छोटा सा गांव दुनेके। साथ खेलने के लिए लड़कियां नहीं मिलती थीं तो हरमनप्रीत ने लड़कों के साथ ही प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया। उन्हीं के बीच अपने खेल को निखारा। पिता हरमंदर सिंह कहते हैं कि तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हरमनप्रीत की कहानी देश की दूसरी खिलाड़ियों से काफी अलग है। तो उनके पास खेलने का माहौल था और ही साथी। लड़कों के साथ गली में क्रिकेट खेलनी शुरू की। वो भी उस माहौल में जहां अपशब्द कहना आम था। लड़के खेल में अपशब्द कहतेे। मैंने उसे रोका नहीं बल्कि कान बंद रखकर शॉट्स से जवाब देने को कहा। हरमन रुकी नहीं और अपने कद के हिसाब से बड़े बल्ले से शॉट्स लगाती रहीं। वे घर में सबसे बड़ी थीं, मां खेलने से रोकती लेकिन मैंने कभी मना नहीं किया। हरमन की टीचर्स से भी क्रिकेट को लेकर बातें सुनने को मिलतीं। इसके बाद भी हमने उसे रोका नहीं। वे बताते हैं कि जब वो पैदा हुई तो सबसे पहले हमने उसे जो टीशर्ट पहनाई उसपर गुड बैटिंग लिखा हुआ था। हमने यह टी-शर्ट आज तक संभाल कर रखी है। लेकिन हमने ये नहीं सोचा था कि यह गुड बैटिंग एक दिन बेस्ट बैट्सवुमन में बदल जाएगी। वैसे हरमनप्रीत के जीवन में टी-शर्ट से कई किस्से जुड़े हुए हैं। वे दंगों के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए हमेशा 84 नंबर वाली टीम इंडिया की टीशर्ट पहनती है। उनके क्रिकेट के शौक के कारण कई लोग उन्हें खिलाड़ियों का नाम लिखी हुई टीम इंडिया की टी-शर्ट गिफ्ट कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने उसे कभी नहीं पहना। क्योंकि उन्हें जिद थी कि वे टीम इंडिया की जर्सी तब ही पहनेंगी जब इसपर उनका खुद का नाम लिखा हुआ हो। उस समय हरमनप्रीत 15 साल की थीं। कमलदीश सिंह सोढी मोगा में प्रीमियर क्रिकेट एकेडमी चलाते थे। अक्सर वे बेहतरीन क्रिकेटर की तलाश में पंजाब के लोकल मैदानों की खाक छानते रहते थे।
ऐसी ही एक खोज के दौरान उनकी निगाह एक ऐसी बच्ची पर पड़ी जो गुरु नानक कॉलेज में लड़कों को धूल चटा रही थी। लंबे-लंबे शॉट्स लगा रही थी। बस फिर क्या था उन्होंने तत्काल हरमनप्रीत को अपनी एकेडमी में एडमिशन दे दिया। इससे पहले उनके पास कोई लड़की ट्रेनिंग नहीं करती थी। वे हरमनप्रीत की ट्यूशन फीस, एकेडमी फीस आदि जमा करते थे। सोढ़ी ने ही हरमनप्रीत को क्रिकेट किट दिलवाई, जूते दिलवाए और उसे बस मन से खेलने का मौका दिया। सोढी सर से कोचिंग लेने के बाद हरमन को फिरोजपुर के एसके पब्लिक स्कूल में शिफ्ट किया गया। वहां टीम के लिए मुकाबला कड़ा था। पिता ने कहा कि वे पढ़ाई के बारे में सोचे, सिर्फ खेल पर ध्यान दे। हरमन ने ऐसा ही किया और टीम में सबसे पहले उनका चयन हुआ। एक स्कूल टीम में शामिल होने के बाद उन्हें पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के कैंप में जगह मिली। ऑलराउंड प्रदर्शन के बाद वे फिरोजपुर की टीम में चुनी गईं। दो साल ट्रेनिंग के बाद उन्हें पंजाब सीनियर टीम में चुना गया। 18 की उम्र में उन्होंने अंडर-19 टीमके लिए खेला और इसके बाद वे नॉर्थ जोन टीम में भी शामिल की गईं। चैलेंजर्स ट्रॉफी के बाद वे एनसीए पहुंच जहां पर उन्हें टीम इंडिया के संभावितों में शामिल किया गया।
2009 में ऑस्ट्रेलिया में हुए महिला वर्ल्डकप के एक मैच में हरमनप्रीत ने जबरदस्त छक्का मारा था। यह इतना लंबा था कि डोपिंग टीम को आश्चर्य हुआ। उनका डोप टेस्ट लिया गया और बैट की जांच भी की गई। लेकिन कुछ भी गलत नहीं पाया गया।
Post published at www.nareshjangra.blogspot.com
साभार: भास्कर समाचार
For getting Job-alerts and Education News, join our Facebook Group “EMPLOYMENT BULLETIN” by clicking HERE. Please like our Facebook Page HARSAMACHAR for other important updates from each and every field.
