Sunday, March 16, 2014

पाप का अन्न (लघु कथा)

एक नवयुवक साधु अपने गुरु के पास रहकर साधना करता था। वह नित्य निकट के गाँवोँ से भिक्षा माँगने जाता और भिक्षा मेँ मिले अन्न से उदरपूर्ति करता। एक दिन जब वह भिक्षा माँगने निकला तो किसी ने उसे बताया कि पास के नगर मे एक व्यक्ति ने आज साधुओँ के भण्डारे का आयोजन किया है, तुम भी वहीँ प्रसाद पा सकते हो। यह सुनकर वह साधु वहाँ पहुँचा और भोजन करके आ गया। रात्रि मे वह साधना करने बैठा, लेकिन यह क्या? उसका तो चित ही स्थिर नही हो पा रहा था। आप यह पोस्ट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट नरेशजांगड़ा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं। वह ज्योँ ही ध्यान लगाता उसे ध्यान मेँ एक सुंदर युवा स्त्री दिखायी देती। साधु प्रयत्न करके थक गया, किँतु उस रात वह ध्यान साधना न कर सका। वह बेचैन हो गया। आखिर भोर होते ही वह अपने गुरु के पास गया। शिष्य तो गुरु के चरणोँ मेँ गिर पड़ा और पिछली रात मेँ जो स्थिति हुई वह उन्हेँ यथावत बताई। यह सुनकर गुरु को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होने शिष्य से पूछा, "कल तुमने भिक्षा कहाँ ली थी?" शिष्य ने भंडारे की बात बता दी। यह सुनकर गुरु ने ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हे ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति ने अपनी कन्या का विक्रय कर प्रभूत द्रव्य (काफी सारा धन) प्राप्त किया था और उस द्रव्य का कुछ अंश उसने भण्डारे मेँ खर्च किया था। गुरू ने यह सब शिष्य को बताया और कहा, "देखा वत्स, अन्न का प्रभाव । व्यक्ति जैसा अन्न खाता है वैसी ही उसकी वृतियाँ बनती है। अब तुम 1-2 दिन उपवास करो तुम्हारी शुद्धि हो जायगी।" यह होता है अन्न का प्रभाव। सदाचार से कमाया हुआ अन्न खाने से ही मनुष्य मेँ सदवृतियोँ का विकास होता है। हिँसा, अनीति, पाप, चोरी, तथा छल कपट से कमाये हुए अन्न के उपयोग से मनुष्य की वृतियाँ वैसी ही बन जाती है
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