Saturday, January 7, 2017

तुम मेरे लिए रोना बंद करो, क्योंकि जब मैं लुट रही थी, तुम भी वहीं-कहीं थे.. दूर

कल्पेश याग्निक (दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर)
क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प अश्रु-जल-से-अपने। 
तुम दान कर चुकी पहले ही, जीवन के सोने से सपने। 
- 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो', जयशंकरप्रसाद

मैं एकलड़की हूं। टूटना मेरी नियति है। नहीं मानूंगी, तो तोड़ दी जाऊंगी। 
नहीं, मुझ पर रोना मत। मेरे लिए आंसू व्यर्थ करना। आज मैं बेंगलुरू की उस भीड़ में दरिंदों के पंजों से नोची गई। तो तुम रोए। कल मैं मुम्बई के उस उत्सव में सड़कों पर घसीटी गई थी। तब तुम चीखे थे। उसी मुम्बई में, जहां मेरे शरीर को छलनी-छलनी कर मेरी आत्मा को झंझोड़ दिया गया था। और मुझे ज़िंदगी मिली, मौत। इच्छा-मृत्यु के लिए भी मेरी इच्छा चली। पूछी किसी ने। हां, किन्तु तुम तब भी पागलों की तरह चिल्लाए थे। न्यायालय में भी। 
अब ये शोर मचाना बंद करो। कभी मैं झारखंड की सिस्टर वाल्सा थी। उस पैशाचिक भाले-तीर-कमान-फावड़े-सरिये ताने आई भीड़ का भयंकर रूप कौन भूल सकता है? या कि भूल ही गए? 
फिर मैं निर्भया कही गई। तुम ही नहीं, पहली बार किसी साधारण, अनजान और अनचाही सी लड़की के लिए तुम्हारे जैसे करोड़ों लोग रोए। केवल रोष, वरन् सड़कों पर उतर आए। 
आक्रोश। आंदोलन। आवेश। आक्रमण। आह्वान। 
इतनी सी थी मैं, कभी मुन्नी खातून तो कभी बेबी फलक। 'इंडियाज़ बेबी' कहा था तुमने। तब भी इकट्‌ठे हुए थे सड़कों पर। बुलंद आवाज़ बने थे। मुझे किसी की घिनौनी मांग के लिए सौंपा जाना तुम्हें किस तरह का धक्का पहुंचा गया था - मैं जानती हूं। 
अकुलाहट। घबराहट। कंपकपाहट। 
मैं अपनी हर चोट पर तुम्हारा मरहम पाती हूं। मैं अपनी हर हार पर तुम्हें अपने ही करीब पाती हूं। मैं अपनी गरिमा पर हुए हर हमले में तुम्हें भी टूटता हुआ पाती हूं। 
मैं अपनी हर बार होने वाली मौत से पहले दी गई मौत पर तुम्हें भी मृतप्राय पाती हूं। 
किन्तु पता नहीं, तुम्हारा इतना मज़बूत हाथ मुझे बचा क्यों नहीं पाता? समझ नहीं सकती, कि तुम्हारा इतना अच्छा साथ मुझे आबाद क्यों नहीं रख पाता? तुम्हारी इतनी बुलंद आवाज़ मुझे ज़िंदाबाद क्यों नहीं कर पाती? 
तुम्हारे इतने चौड़े कांधे अंतत: मेरी लुटी, पिटी, टूटी -हां, किन्तु झुकी- लाश बने जिस्म को ही उठाने के काम क्यों आते हैं? 
पहले कहां होते हो, तुम? उस समय क्यों नहीं आते? 
मुझे ही इतने नामों से नहीं जाना जाता। तुम तो अक्सर खाकी वर्दी में होते हो। 
रौबीली। भारी-भरकम। चुस्त-दुरुस्त। यूं सभी डरते हैं तुमसे। कुछ तुम पहले से थे डरावने। कुछ बना दिए गए। और बचा हुआ डरावना चेहरा तुमने ख़ुद ओढ़ लिया। 
कॉल ऑफ ड्यूटी जो है। 
तो फिर तुम इस फ़र्ज को निभाने तबाही के बाद ही क्यों आते हो? 
कभी तुम खुफ़िया बातंे पता करते हो। यही काम होता है तुम्हारा। सफेदपोशों की इस ड्यूटी को बजाने में तो तुम इतने चालाक, इतने होशियार हो कि परिंदा भी उनकी सत्ता, उनके बंगलों, उनके बगलों से गुज़र नहीं सकता। तुम पहले ही ताड़ जाते हो। पकड़ लेते हो। अकड़ दूर कर देते हो। तो उनके परिंदों को मारने वाले, तुम मुझे मारने वाले दरिंदों से क्यों डरते हो? कभी भी, कहीं भी, किसी भी तरह की, कोई भी कर रहा हो, किसी भी वक्त मगर ऐसी कोई साजिश तुम नहीं जान पाते? क्यों? 
कभी तुम सरकार होते हो। बहुत गंदा, घृणित, लिजलिजा बोलने वाले तुम्हारे आस-पास होते हैं। वही, उबकाई सी बातें- मेरे कपड़ों, घूमने, हंसने और खुलकर चलने को मेरा ही दोष बताकर, नारी गरिमा पर हमला करने वालों की मदद करने वाले। और मज़े में, इस तरह चर्चा में आने वाले। फिर भी, तुम सरकार बनकर, मेरे लिए चिंता जताते हो। पिछली बार तो कानून भी बदल दिया था। 
जब तुम मुझे नोंचने वाले हर हाथ को सचमुच सजा देना चाहते ही हो - तो उस कलंकित हाथ को पहले ही क्यों नहीं रोक पाते? 
जब तुम कानून बदलने के इतने बड़े, इतने कठिन काम करने को हमेशा तैयार हो - तो कानून के रखवालों को ऐसे तैयार क्यों नहीं करते कि वो हमेशा घात लगाए रखें। कि वो हमेशा पूछताछ करते रहें। कि वो गश्त करते रहें। कि वो पहले ऐसे पाप कर चुके, सलाखों सेनिकले, जमानत पर आज़ाद आतताइयों को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखें? क्यों नहीं ऐसा हो सकता? 
और कभी तुम टेक्नोलॉजी के जानकार होते हो, न? तो कोई चिप क्यों नहीं बना देते? किसी महिला की प्रतिष्ठा पर भूखे भेड़िये सा जो टूटा हो और इसकी सज़ा पाकर छूटा हो - उसके शरीर में प्लांट करने के लिए ऐसी ही चिप चाहिए। जहां ऐसा हमलावर जाए, वहीं यह चिप सबसे करीब के थाने में अलार्म बजा दे। बस, तुम्हें उसका पीछा ही तो करना होगा। तुम्हारे पुलिस वाले साथी कर लेंगे बाकी काम। 
और क्या बताया था पिछली बार तुमने? क्या कहते हैं - सर्जिकल या केमिकल कैस्ट्रेशन? बिल्कुल, तुम पुरुषों को लगातार रोज़, शर्मिंदा करने वालों को पुरुष ही क्यों रहने दो? वैसे, पुरुषार्थ का अर्थ तो रक्षा करना है। सुरक्षा देना है। और, स्पष्ट है जब पुरुषार्थ शब्द बना होगा, तब नारी कोमल थी। तो रक्षा उसी की करने का आशय होगा। 
आज मैं कोमल नहीं हूं। मेरा मन कोमल है। आज मैं कमजोर नहीं हूं। तुमने मुझ पर इतनी दया दिखा दी है कि कमजोर बना दी गई हूं। आज मैं रोती नहीं। रुलाई जाती हूं। 
तुम मेरे साथ रोना बंद करो। 
ये जो बेंगलुरू में मेरे साथ नीचता हुई, उसका वीडियो देखना-लाइक करना- शेयर करना बंद करो। 
क्योंकि उस वीडियो में मेरे साथ जो अक्षम्य हो रहा है, उसे उसी गली के कोने से तुम भी तो देख रहे हो? या कि उस भीड़ भरे नए साल के जश्न में मुझे आहत करने वाले जब गायब हो गए, तो तुम उस वीडियो में मुझे ढांढ़स देते, मेरा साथ देते, मुझे संभालते दिख रहे हो। तुम्हारी इस मानवीयता से ही, मेरी सिसकियां थमी हैं। 
किन्तु वीडियो को इसलिए औरों को मत भेजना क्योंकि मेरे जैसी ही कोई पूछ बैठेगी - उस समय क्यों वह हाथ तोड़ दिया जो ग़लत इरादे से बढ़ा था? 
और यूं भी, तुम जब पुलिस के सबसे बड़े कमिश्नर बनकर जब यह दुर्बलता दिखाते हो कि सारे वीडियो फुटेज देख लिए; कोई ग़लत बात होती नज़र नहीं पा रही, तब मैं फफक-फफक कर रो पड़ती हूं। फिर मन समझाता है : कोई आगे ही नहीं रहा। कानून के हाथ लम्बे तो है किन्तु बंधे होते हैं। 
और कानून तोड़ने वालों के? खुले रहते हैं। 
मैं लड़की हूं। मुझे झुकाने वालों के तो अनगिनत हाथ हंै। असीम लम्बाई है। अनंत शक्तिशाली हैं। 
हां, मैं अकेली रहना नहीं चाहती। मैं बचपन से ही लड़कों के साथ रही हूं। खेली-कूदी हूं। पापा, भाई, दोस्त पति, सब पुरुष ही तो हैं। मुझे हर तरह का प्यार पुरुषों से ही मिला है। संबल पुरुषोंं से ही मिला है। 
किन्तु अब मैं रोना नहीं चाहती। तुम लड़ो या लड़ो, मैं लड़ूंगी। मैं तुम्हारे साथ की जगह, अपने हाथ पर भरोसा करूंगी। तुम चीखो, भीड़ वनों, भाषण दो या लेख लिखो - मुझे अब किसी की हमदर्दी नहीं चाहिए। 
हां, मेरी इस लड़ाई में आना हो, तो मैं खुलकर हां कहूंगी। 
तुममेरे लिए लड़ो, असंभव है। किन्तु लड़ना ही होगा। 
क्योंकिफिर भी तुम मेरे लिए नहीं, अपनी बहन-बेटी-मां-पत्नी-प्रेमिका-मित्र के लिए ही तो लड़ोगे। 
लड़की के लिए लड़ना आसान नहीं होता। 
दोनों अर्थों में।