सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भले ही बेहद चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहे हो लेकिन यह भी सच है कि इन बैंकों में सुधार को लेकर जितनी कोशिश अभी हो रही है उतनी पहले कभी नहीं हुई। इसका एक अहम उदाहरण सरकारी
बैंकों में विलय को बढ़ावा देने का मुद्दा है जिस पर एक दशक से बात हो रही है लेकिन मोदी सरकार ने धीरे-धीरे मजबूती से इसे आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक में छह बैंकों के विलय के बाद वित्त मंत्रलय अगले कुछ हफ्तों के भीतर सरकारी बैंकों में एक और बड़े विलय की घोषणा करने जा रहा है। तैयारी इस बात की है कि एक बड़े बैंक में एक मझोले व और एक छोटे बैंक का विलय किया जाए। पहले चरण में वित्त मंत्रलय की नजर बैंक ऑफ बड़ौदा या केनरा बैंक पर है। इन दोनों को शीर्ष बैंक बनाकर इनमें से किसी एक में देना बैंक को शामिल करने पर चर्चा हो रही है। मझोले स्तर के जिन बैंकों के नाम पर विचार हो रहा है उसमें सिंडीकेट बैंक या विजया बैंक हो सकते हैं।
बैंकिंग सूत्रों का कहना है कि नीति आयोग के साथ विचार-विमर्श के बाद सरकारी बैंकों में विलय की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। दरअसल, सरकारी बैंकों में एक साथ हर मोर्चे पर सुधार लाने की नीति लागू कर रही है। एक तरफ इन बैंकों में एनपीए घटाने का अभियान चल रहा है तो दूसरी तरफ विलय के जरिये बड़े वित्तीय संस्थान बनाने का काम भी किया जा रहा है।
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साभार: जागरण समाचार
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