शिक्षा... इकोनॉमिस्ट ने कहा- भारत में 'शिक्षा का अधिकार' कानून प्रभावी है। दुनिया में सबसे ज्यादा भारत में बच्चे स्कूल जाते हैं। पर यह चिंता की बात है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ है। अभी काफी काम किया जाना बाकी है।
जयपुर के प्राइमरी स्कूल के ग्राउंड फ्लोर में बैठे पांच दर्जन बच्चे लंच की छुट्टी का इंतजार कर रहे हैं। स्कूल में तीन शिक्षक हैं, लेकिन दो गैर-हाजिर। एक 'बीमार' है अौर दूसरी मुख्य अध्यापिका दोपहर को यह कहकर चली गईं कि उन्हें 'कोई काम करना है।' कोई बच्चा ज्यादा कुछ सीख नहीं रहा है। उन बच्चों के सामने कविता की मोटी-सी किताब खुली पड़ी है, जिन्हें सरल से वाक्य पढ़ने में भी दिक्कत आती है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। ऊपर वाली मंजिल पर नज़ारा अलग है। चैरिटी संस्था 'प्रथम' की इंस्ट्रक्टर रेखा गुर्जर बच्चों से ब्लैकबोर्ड के पास आकर वहां लिखा पढ़ने को कहती हैं। उनके प्रश्न पूछते ही बच्चों के हाथ ऊपर उठ जाते हैं। पाठ्यक्रम को बच्चों के स्तर के अनुरूप करके 'प्रथम' के 'लर्निंग कैम्प' 40 दिनों में बच्चों को मूलभूत हिंदी और गणित सीखा देते हैं। राजस्थान में 'प्रथम' के प्रमुख ऋषि राजवंशी कहते हैं- 'बच्चे जहां से वहां से आपको शुरुआत करनी होगी, वहां से नहीं जहां आपको लगता है उन्हें होना चाहिए।'
भारत में 26 करोड़ बच्चे स्कूलों में जाते हैं। यह संख्या किसी भी देश से ज्यादा है। 14 वर्ष की उम्र तक स्कूल जाना अनिवार्य बनाने वाले शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के कारण पिछले दो दशकों में स्कूलों में बच्चों का नामांकन लगातार बढ़ता रहा है। लेकिन, संख्या के साथ उनका ज्ञान नहीं बढ़ा है। 'प्रथम' के मुताबिक पांचवीं कक्षा (10 साल के बच्चे) आधे बच्चे दूसरी कक्षा की कहानी नहीं पढ़ सकते। सिर्फ चौथाई बच्चे साधारण भाग कर सकते हैं। दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की यामिनी अय्यर कहती हैं- 'स्कूलों को ज्ञान के केंद्र में बदलने में हम बुरी तरह नाकाम रहे हैं।' इसके नतीजे बहुत गंभीर हैं, जिनका आकलन मुश्किल है। भारत बहुत प्रतिष्ठित ग्लोबल टेस्ट 'प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल असेसमेंट' (पीसा) में 2021 तक भाग नहीं ले पाएगा। हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के 14 साल के बच्चों ने 2009 में यह टेस्ट दिया था। वे शंघाई या पूर्वी एशिया के ऊंचे प्रदर्शन करने वाले स्कूली बच्चों की तुलना में स्कूलिंग की दृष्टि से पांच साल पीछे थे।
एक-चौथाई शिक्षक तो उस वक्त गायब होते हैं, जब उन्हें स्कूल में होना चाहिए। वेतन समस्या नहीं है। पब्लिक स्कूल के टीचर का वेतन स्थानीय टीचर की तुलना में दस गुना होता है। कई आवेदक स्कूल बोर्ड्स को रिश्वत देकर नौकरी हासिल करते हैं। वे इसे कॅरिअर की बजाय आराम की नौकरी मानते हैं। फिर 'बीमारी के अवकाश' के लिए काफी उदार भत्ते हैं, जिन्हें प्राय: छुट्टी के लिए लिया जाता है। फिर शिक्षक अपने राजनीतिक संरक्षकों के चुनाव प्रचार के लिए हफ्तों गायब रह सकते हैं। यदि स्कूलों में अधिक शिक्षक मौजूद हो तो भी खास फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि देश के 17 हजार शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान निम्न श्रेणी की डिग्री की दुकानें हैं। शायद ही किसी को सिखाया जाता हो कि कक्षा को कैसे मैनेज करना चाहिए।
- आरटीई के तहत हर गांव में एक किमी के भीतर स्कूल होना अनिवार्य है। यही वजह है कि एक-तिहाई प्राथमिक स्कूलों में 50 से कम बच्चे हैं। गांव के लोगों के शहर में जाने के कारण 5 हजार स्कूलों में तो बच्चे ही नहीं हैं।
- आधे शहरी बच्चे और 20 फीसदी ग्रामीण बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। सरकारी स्कूलों में नामांकन 1.30 करोड़ से गिरा है तो निजी स्कूलों में 1.70 करोड़ से बढ़ा है।
- चीन की तुलना में 35 फीसदी अधिक बच्चे होने के कारण भारत में चार गुना अधिक स्कूल हैं। कानूनन हर बच्चे को अगले साल अगली कक्षा में भेज दिया जाता है, इसलिए शिक्षक बच्चों को अच्छी तरह पढ़ाने की प्रेरणा नहीं होती।
- दिल्ली के गरीब क्षेत्रों में सर्वे में पता चला कि छठी कक्षा के बच्चों का गणितीय ज्ञान तीसरी कक्षा के बराबर है और नौवीं कक्षा से जो अपेक्षित होता है वह गणित का ज्ञान साढ़े चार ग्रेड नीचे है।
- भारत शिक्षा पर जीडीपी का 2.7 फीसदी खर्च करता है जो ब्राजील देशों से कम है। दो-तिहाई स्कूलों में बिजली तक नहीं है। ज्यादातर बजट या तो खर्च नहीं होता या बहुत बुरी तरह खर्च होता है।
- यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की गीता किंगडन ने आठ राज्यों के बजट का अध्ययन कर बताया कि 2011 से 2015 के बीच फंडिंग 80 फीसदी बढ़ी है। फिर भी टेस्ट स्कोर गिरा ही है। शिक्षा केंद्र राज्यों की सम्मिलित जिम्मेदारी है।
- 2013 के अध्ययन के मुताबिक आंध्र प्रदेश में कम लागत के निजी स्कूलों ने गणित तेलुगु भाषा में वही नतीजे दिए जो सरकारी स्कूलों के थे, जबकि वहां शिक्षकों का वेतन सरकारी स्कूलों की तुुलना में बहुत कम है। इससे प्रोत्साहित होकर पंजाब राजस्थान जैसे राज्य पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर स्कूल स्थापित करने में लगे हैं।
- अब टेक्नोलॉजी से ही उम्मीद है। अब तक तो यह धनी बच्चों को परीक्षा पास करने में मदद करने वाले सॉफ्टवेयर बेचने तक सीमित रही है। आईटी के दिग्गज नंदन नीलेकणि 'एकस्टेप' लेकर आए हैं, जो बच्चों को बेहतर लर्निंग मटेरियल मुहैया कराएगा। इसका लक्ष्य 20 करोड़ बच्चों को मदद पहुंचाना है। देश को इस तरह के महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों की जरूरत है।
केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति लाने वाली है पर यह टलता ही जा रहा है। इसमें कुछ समझदारी भरे आइडिया होने चाहिए पर लगता यही है कि यह शिक्षक संघों को ज्यादा विचलित नहीं करेंगे, जो शर्मनाक होगा। जब 2 करोड़ बच्चे हर साल स्कूल जाने की उम्र में रहे हैं, तो इस तरह की सतर्कता का मतलब है प्रतिभा की बड़े पैमाने पर बर्बादी।
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साभार: The Economist और भास्कर समाचार
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